आराेपियों को ले जाती पुलिस
- फोटो : amar ujala
टेलीग्राम ग्रुप से होता था सौदा
बता दें कि किडनी देने वाला युवक आयुष मूल रूप से बिहार का रहने वाला है और उत्तराखंड से बीए (4th की पढ़ाई कर रहा है। पुलिस जांच में सामने आया कि मरीजों को फंसाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जाता था। मेरठ में डायलिसिस के दौरान डॉ. अफजल नामक व्यक्ति ने पारुल से संपर्क किया। अफजल ने उन्हें एक टेलीग्राम ग्रुप से जोड़ा, जहां किडनी दाताओं और जरूरतमंदों की जानकारी साझा की जाती थी।
पुलिस की गिरफ्त में आरोपी
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सील होने के बाद भी जारी था खेल
पूरी प्रक्रिया के दौरान कोई भी आधिकारिक फाइल तैयार नहीं की जाती थी। डॉ. रोहित उर्फ राहुल अपनी टीम के साथ मिलकर सर्जरी को अंजाम देता था। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के अनुसार, मार्च में सूचना मिलने पर आरोही हॉस्पिटल को सील किया गया था। लेकिन गिरोह इतना शातिर था कि 23 मार्च को आरोपी डॉ. राजेश ने मेडलाइफ हॉस्पिटल के संचालक के साथ साझेदारी कर ली और वहां अवैध काम शुरू कर दिया। अब तक शहर के सात बड़े नर्सिंग होम का नाम इस रैकेट में सामने आया है, जहां 50 से ज्यादा ट्रांसप्लांट होने की आशंका है।