क्रिप्टो करेंसी के माध्यम से गैरकानूनी कामों के लिए हो रहे पैसे के लेनदेन को आईआईटी का सॉफ्टवेयर ब्लॉक स्टैश आसानी से पकड़ रहा है। आईआईटी से इंक्यूबेटेड कंपनी ने यह सॉफ्टवेयर तैयार किया है। इस साॅफ्टवेयर का आईबी, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल पुलिस, ईडी भी इस्तेमाल कर रही है।
2009 में लांच हुई क्रिप्टोकरेंसी एक ऐसा माध्यम है जिसमें हजारों करोड़ों रुपये एक स्थान से किसी दूसरे स्थान पर आसानी से भेजे जा सकते हैं। यह एक ऐसी करेंसी होती है, जिसके लिए बिना किसी केवाईसी के करोड़ों के लेनदेन होते हैं। लेनदेन होने वाले व्यक्तियों के अलावा अन्य किसी को भी इसकी जानकारी नहीं होती है। इसमें व्यक्ति अपने क्रिप्टो अकाउंट से दूसरे व्यक्ति के क्रिप्टो अकाउंट में धनराशि का ट्रांसफर कर सकता है। ऐसे में कई गैरकानूनी कामों के लिए इस माध्यम का उपयोग शातिर कर रहे हैं। इसी कारण आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र और ब्लॉक स्टैश कंपनी के फाउंडर दीपेश चौधरी और उनकी टीम ने ब्लॉक स्टैश नाम का सॉफ्टेवयर तैयार किया है। इसकी मदद से कई राज्यों की पुलिस ने अब इस सॉफ्टवेयर की मदद से ऐसे अपराधियों को पकड़ने का काम भी शुरू कर दिया है। इस साॅफ्टवेयर का आईबी, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल पुलिस, ईडी भी इस्तेमाल कर रही है।
ऐसे काम करता है साॅफ्टवेयर
कंपनी के फाउंडर दीपेश चौधरी ने बताया कि क्रिप्टो से होने वाले लेनदेन का एक रिकाॅर्ड ब्लॉकचेन में सुरक्षित होता रहता है। साथ ही जितने लोग क्रिप्टोवॉलेट का उपयोग कर रहे हैं, उनके पास भी लेनदेन का रिकाॅर्ड सेव होता है। हालांकि यह जानना मुश्किल होता है कि लेनदेन किन दो व्यक्तियों के बीच हो रहा है। दीपेश कहते हैं कि इसके लिए ब्लॉकचेन में स्वयं का एकाउंट खोला, अब जो भी लेनदेन होता है, उसकी एक कॉपी हमारे पास भी सुरक्षित होती रहती है। दीपेश कहते हैं कि हर लेनदेन के दौरान टैग ढूंढते हैं और उसका रियल वर्ल्ड के डाटा से मिलान करते हैं। ब्लॉक स्टैश सॉफ्टवेयर उसकी पहचान कर लेता है और लेनदेन करने वाले का पता करता है।
रोजाना हो रहे पांच लाख लेनदेन
दीपेश ने बताया कि रोजाना इस माध्यम से तकरीबन पांच लाख लेनदेन होते हैं। इनकी रकम कभी करोड़ तो कभी खरब में पहुंचती है। उन्होंने बताया कि ब्लॉकचेन पर करीब 250 ब्लॉक हैं और हर ब्लॉक में 2000 से अधिक लेनदेन हैं। ब्लॉक को आप लेजर के रूप में समझ सकते हैं।
2021 से आईआईटी से किया एमटेक
दीपेश ने एकेटीयू से बीटेक और आईआईटी कानपुर से एमटेक करने के बाद यहीं पर स्टार्टअप को इंक्यूबेट किया है। वह कहते हैं कि कई बड़े विभागों ने इस साॅफ्टवेयर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। मूल रूप से कोलकाता के रहने वाले दीपेश शहर में ही पले बढ़े हैं। उन्होंने 2021 से आईआईटी से एमटेक किया है।