नर्वल मोड़ पर लूट की साजिश दिखाने का आरोप
दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को मुखबिर से सूचना मिली थी कि बदमाश नर्वल मोड़ स्थित जीटी रोड पर वाहनों को रोककर लूटपाट करेंगे। पुलिस टीम मौके पर पहुंची और दावा किया कि 23 अगस्त की रात करीब 12:30 बजे बदमाशों ने बबूल की डालियां सड़क पर डालकर ट्रक और डीसीएम रोकने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस मुठभेड़ में राकेश पाठक समेत 12 लोगों की गिरफ्तारी और असलहे व बम बरामद होने की बात कही गई। इस आधार पर महाराजपुर थाने में दो मुकदमे दर्ज किए गए। तत्कालीन उपनिरीक्षक एवं नर्वल थानाध्यक्ष रमेश चंद्र भटोले ने विवेचना के बाद आरोपपत्र न्यायालय भेजे थे।
डीसीएम चालक और क्लीनर ने खोली पोल
सीआईडी जांच में डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बृजेन्द्र सिंह के बयान अहम रहे। दोनों ने मुठभेड़ की कहानी का समर्थन नहीं किया। उनके मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को वे डीसीएम में साबुन लादकर कानपुर से बनारस जा रहे थे। रामादेवी चौराहे पर एक सिपाही वाहन में बैठा और बाद में छह अन्य लोगों को भी बैठाया गया। इसके बाद डीसीएम को महाराजपुर थाने ले जाया गया। दोनों के अनुसार, थाने में वाहन में बैठे पांच लोगों में से दो भाग गए और तीन को पुलिस ने पकड़ लिया।
नर्वल मोड़ पर बदमाशों ने नहीं रोका था
उनसे दो तमंचे, कारतूस और तीन बम मिलने की बात कही गई। चालक और क्लीनर ने आरोप लगाया कि पुलिस ने पकड़े गए लोगों से मारपीट की और बाद में अन्य लोगों को पकड़कर लाई। पुलिस एक राइफल और बंदूक भी लेकर आई थी। अगले दिन उनसे लिखे हुए कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए, लेकिन उन्हें पढ़कर नहीं सुनाया गया। दोनों ने यह भी कहा कि डीसीएम को नर्वल मोड़ पर बदमाशों ने नहीं रोका था। सीआईडी जांच के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत न्यायालय में दर्ज उनके बयानों में भी इन कथनों की पुष्टि हुई।
घर से उठाने और लाइसेंसी हथियार दिखाने का आरोप
शिकायतकर्ता देव प्रसाद पाठक समेत अन्य गवाहों ने जांचकर्ता को बताया कि राकेश पाठक, दिनेश कुमार, शिवकुमार और जगदीश द्विवेदी को घर से सोते समय उठाकर ले जाया गया था। आरोप है कि राकेश पाठक के पिता सदाशिव की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और देव प्रसाद पाठक की लाइसेंसी राइफल भी पुलिस अपने साथ ले गई और बाद में उन्हें मुकदमों में बरामद हथियार के रूप में दर्शाया। सीआईडी निरीक्षक आरपी सिंह ने मौखिक, अभिलेखीय और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ झूठे साक्ष्य और दस्तावेज तैयार करने, झूठा आरोप लगाने, अवैध हिरासत और मारपीट समेत विभिन्न अपराधों के प्रथम दृष्टया साक्ष्य पाए।
छह पुलिसकर्मियों की हो चुकी है मौत
मामले में नामजद 18 पुलिसकर्मियों में तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी, उपनिरीक्षक दुर्बीन सिंह, उपनिरीक्षक रमाकांत, आरक्षी राजन सिंह, आरक्षी उदयशंकर पांडेय और आरक्षी महेंद्र सिंह की मृत्यु हो चुकी है।
आठ धाराओं में ये हैं आरोप
- धारा 194: मृत्युदंड योग्य अपराध में दोषसिद्धि कराने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ना।
- धारा 195: गंभीर अपराध में दोषसिद्धि कराने के लिए झूठे साक्ष्य देना या गढ़ना।
- धारा 182: लोकसेवक को झूठी सूचना देना।
- धारा 211: नुकसान पहुंचाने के इरादे से झूठा आपराधिक आरोप लगाना।
- धारा 218: लोकसेवक द्वारा नुकसान पहुंचाने या बचाने के इरादे से गलत अभिलेख तैयार करना
- धारा 220: कानून के विरुद्ध किसी व्यक्ति को मुकदमे के लिए भेजना या हिरासत में रखना।
- धारा 323: स्वेच्छा से चोट पहुंचाना।
- धारा 34 : अवैध रूप से बंधक बनाना।
12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी
सीआईडी जांच में प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिलने के बाद वर्ष 1991 की फर्जी मुठभेड़ के मामले में 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। इनमें सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक बीडी सारस्वत, योगेंद्र नाथ सिंह और रमेश चंद्र भटोले, सेवानिवृत्त हेड कांस्टेबल हृदय नारायण तिवारी तथा सेवानिवृत्त आरक्षी तेज नारायण तिवारी, बैजनाथ, चंद्रबली, विद्याकांत शुक्ला, रामआसरे और जागेश्वर यादव शामिल हैं। इनके अलावा आरक्षी बृजेश कुमार और रमेश कुमार तिवारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई है।