यह है मामला
एक मई को बैंक के मुख्य महाप्रबंधक को भेजे गए गुमनाम पत्र में बताया गया कि 121-363 सिविल लाइंस कानपुर नगर कटरी बिठूर कला निवासी शिरोमणि यादव का 19 जुलाई 2006 से बैंक में खाता (संख्या 11022343963) है। इस खाते में कोई भी मोबाइल नंबर दर्ज नहीं है। खाते में 14,60,500 रुपये थे। इस खाते में लंबे समय से लेनदेन न होने के कारण इसे 2022 में निष्क्रिय कर दिया गया। पत्र में बताया गया कि बैंक में उप प्रबंधक स्तर के अधिकारी व एसबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन के पदाधिकारी ने अन्य अफसरों और कर्मियों के साथ मिलकर फर्जी ई-केवाईसी करके इस निष्क्रिय खाते को 25 मार्च 2025 को सक्रिय करवाया। नॉन होम शाखा विश्व बैंक बर्रा से 2 अप्रैल 2025 को खाते से पहली बार में पांच लाख और फिर 9 अप्रैल को 4.60 लाख रुपये निकाले गए। इससे पहले 4 अप्रैल को पांच लाख का भुगतान पीबीबी कानपुर से कराया गया। विश्व बैंक शाखा क्षेत्रीय कार्यालय दो के अधीन नहीं आती है। इसके बाद भी यहां से रुपये निकाल दिए गए।
ऐसे किया नियमों को तार-तार
केवाईसी का सत्यापन
ई-केवाईसी या साधारण केवाईसी दोनों प्रक्रियाओं में ही बैंक शाखा की जिम्मेदारी होती है कि अगर कोई पते में परिवर्तन हो रहा है तो उस पते पर धन्यवाद पत्र (थैंक लेटर) भेजे। ग्राहक उस पत्र को मय रजिस्ट्री या स्पीड पोस्ट लिफाफे के साथ लाकर शाखा के अधिकारी के सुपुर्द करे, तो ही खाते पर लेनदेन को चालू किया जाएगा। इसमें इस प्रक्रिया को अपनाया ही नहीं गया।
भुगतान करने वाली शाखा की कमियां
जब कोई बड़ा भुगतान किया जाता है तो सभी बैंकों का भुगतान अधिकारियों को निर्देश है कि खाताधारक के अलावा कोई और भुगतान लेने आए तो सबसे पहले ग्राहक के दर्ज मोबाइल नंबर पर फोन करके इसकी जानकारी की जाए। भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर चेक के पीछे करवाए जाएं। साथ ही भुगतान की पूर्ण सुरक्षा के लिए उस व्यक्ति की आईडी ली जाए। इसका पालन भी इस मामले में नहीं किया गया।
चेक बुक मंगवाना
इस घोटाले में नॉन चेक अकाउंट को चेक अकाउंट करवाया गया। चेक बुक शाखा में मंगवाई गई तो किसने उसे प्राप्त किया। दरअसल घोटाला करने वाले ने फर्जी पता दर्ज करवाया था। इस स्थिति में डाक विभाग से पता गलत है या नहीं मिला के साथ चेक बुक शाखा को वापस मिलनी चाहिए थी। ऐसी सूचना मिलते ही खाते पर तत्काल रोक लगा दी गई होती तो घोटाला नहीं होता। अगर चेक बुक दर्ज पते के इतर अन्य पते पर मंगवाई गई तो शाखा के अधिकारियों की भी संलिप्तता साफ है। खाताधारक का पता भी गलत दर्ज है। सही पता केवल कुछ उच्च अफसरों के पुराने डाटा से मिल सकता है। इस पर कोई भी जवाब नहीं दिया जा रहा है।