लखनऊ की भ्रष्टाचार निवारण कोर्ट में मुकदमा भी लंबित है। परमट स्थित संपत्ति संख्या 13/388 और 13/390 पर अवैध कब्जे को लेकर डीएम से शिकायत की गई थी जिसकी टीम ने रिकॉर्ड से जांच की तो वक्फ संपत्ति निकली। संपत्ति संख्या 13/390 को तत्कालीन डीएम ने वर्ष 2001 में निष्क्रांत संपत्ति घोषित किया था। भारत के विभाजन के दौरान पाकिस्तान जाने वाले लोगों द्वारा छोड़ी गई संपत्ति को निष्क्रांत संपत्ति कहते हैं। इसे लेकर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में एक याचिका लंबित है और संपत्ति पर स्टे मिला हुआ है।
अखिलेश दुबे और लवी मिश्रा
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वर्ष 2010 में ही खत्म हो गई थी संपत्ति की पट्टा अवधि
संपत्ति संख्या 13/388 को कोर्ट के आदेश पर वर्ष 1979 में नीलाम किया गया। नीलामी आदेश के खिलाफ अपील हुई लेकिन कोई राहत नहीं मिली। मूल नीलामी क्रेता प्रभावती अग्रवाल ने अपना आधा भाग और रंजना काशीवार ने अपना पूरा भाग वर्ष 1985 में अलका खेमका, निर्मला गुप्ता व उमा ओमर को बेच दिया। सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित इस 265.40 वर्गमीटर की संपत्ति का मुन्नीदेवी, विवेक कुमार गुप्ता, प्रभावती देवी अग्रवाल, उमा ओमर, अलका खेमका और निर्मला गुप्ता ने किदवईनगर निवासी राजकुमार शुक्ला को मुख्तारआम नियुक्त कर दिया, जब कि इस संपत्ति की पट्टा अवधि वर्ष 2010 में ही खत्म हो गई थी।
उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में विचाराधीन है मामला
इसके बावजूद राजकुमार शुक्ला ने बिना किसी अधिकार के वर्ष 2016 में यह संपत्ति अखिलेश दुबे के भाई सर्वेश दुबे और उनकी फर्म मेसर्स केनरी ऐपेरलेस प्रा. लि. को बेच दी। मूल पट्टाधारक को यह संपत्ति आवासीय प्रयोजन के लिए दी गई थी और उसे बेचने का अधिकार नहीं था। इसके बावजूद राजकुमार ने सर्वेश को जमीन बेच दी। इस फर्जीवाड़े का खुलासा होने पर एसआईटी ने वर्ष 2016 में एक एफआईआर दर्ज की थी जिसमें वर्ष 2021 में लखनऊ की भ्रष्टाचार निवारण कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। वर्तमान मुतवल्ली ने संपत्ति को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड लखनऊ में बेदखली वाद भी दाखिल किया है, जो विचाराधीन है।
कोर्ट ने अधिवक्ता अखिलेश दुबे को भेजा जेल
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पट्टे पर आवासीय प्रयोग के लिए दी गई थी जमीन
तत्कालीन मुतवल्ली अबु सईद ने वक्फ संपत्ति भाग संख्या 69 को जिला जज की अनुमति से 99 वर्ष के रजिस्टर्ड पट्टे पर हाफिज मोहम्मद हलीम को प्रदान किया गया। पट्टे में जमीन की शर्त आवासीय प्रयोग के लिए थी। व्यवसाय व व्यापार के लिए मुतवल्ली व जिला जज की अनुमति लेना आवश्यक होता है। इसके साथ ही पट्टेधारक को जमीन पांच वर्ष के लिए किराए पर देने की अनुमति थी बिक्री नहीं थी। इसके बाद भी नियमों का उल्लंघन किया गया।