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Kannauj: सपा के गढ़ इत्रनगरी में हर सीट पर खिला है कमल, कामयाबी दोहराने की चुनौती

Sun, 07 Apr 2024 05:39 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज

सार

भाजपा के गठन के चार दशक बाद पहली बार हर सीट पर भगवा का परचम है। सबसे पहले 1991 में सदर विधानसभा सीट जीत कर आगाज किया था। 1991 में विधानसभा चुनाव में पहली जीत मिली थी। लोकसभा में हार हुई थी।
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कन्नौज स्थित भाजपा कार्यालय - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आज से 44 साल पहले वर्ष 1980 में गठन के बाद इत्रनगरी में होने जा रहे लोकसभा में पहली बार ऐसा होगा कि यहां की सभी सीट पर भाजपा का परचम लहरा रहा है। वजह साफ है अपने अस्तित्व में आने के बाद यह पहली बार है कन्नौज की हर सीट पर भाजपा का कमल खिला हुआ है। गठन के 11 साल बाद 1991 में सदर विधानसभा सीट जीत कर जिले में सियासी कामयाबी हासिल करने वाली भाजपा अब यहां की सभी सीटों पर काबिज है।

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सपा का गढ़ कहे जाने वाले कन्नौज में यह पहली बार है कि लोकसभा के साथ ही विधानसभा की सभी सीटों पर कब्जे के बीच भाजपा कार्यकर्ता अपनी पार्टी का स्थापना दिवस मनाएंगे। सूबे की सत्ता पर काबिज भाजपा का कन्नौज में समय-समय पर कमल खिलता रहा है। यहां भाजपा को अपना कमल खिलाने में शुरू में काफी जतन करना पड़ा था। पहली कामयाबी राम मंदिर आंदोलन की लहर के दौरान 1991 में हुए विधानसभा चुनाव में मिली थी। तब पहली सदर सीट से भाजपा ने अपना खाता खोला था।

हालांकि, उस चुनाव में लोकसभा की सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी। उसके बाद बारी-बारी से छिबरामऊ और तिर्वा में भी जीत मिलती गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में सभी तीन सीट पर ऐतिहासिक जीत हासिल हुई। इसके पहले 2019 लोकसभा चुनाव में भी संसदीय सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ था। इस तरह इस समय जिले की सभी सीट पर भाजपा का ही कब्जा है।

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विधानसभा में कर चुकी है क्लीन स्वीप
कन्नौज जिले की तीनों विधानसभा सीट के लिए हुए चुनाव में भाजपा सभी पर जीत हासिल कर चुकी है। तीन चुनाव में एक साथ तीन में से दो सीटों पर जीत मिली। 1993 में कन्नौज सदर और छिबरामऊ, 1996 में कन्नौज सदर और तिर्वा, 2017 में छिबरामऊ और तिर्वा सीट पर यह सफलता मिली थी। 2022 के चुनाव में पहली बार एक साथ तीनों सीट कन्नौज सदर, छिबरामऊ और तिर्वा में कामयाबी मिली। इससे पहले यह कारनामा 2012 के चुनाव में सपा ने किया था।

लोकसभा चुनाव में दो बार कामयाबी
लोकसभा चुनाव में भाजपा कन्नौज संसदीय सीट पर दो बार जीत का परचम लहरा चुकी है। 1980 में पार्टी के गठन के बाद पहली बार 1996 में इस सीट से चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। उस समय कन्नौज जिला नहीं बना था। भाजपा को दूसरी जीत पिछले 2019 के लोस चुनाव में मिली। सुब्रत पाठक दूसरे भाजपा सांसद निर्वाचित हुए।

जनसंघ को कभी नहीं मिली कामयाबी
1980 में वजूद में आने से पहले भाजपा को जनसंघ के नाम से जाना जाता था। देश की आजादी के बाद हुए किसी भी चुनाव में जनसंघ को यहां कामयाबी नहीं मिली। वर्ष 1967 में पहली बार इस सीट के लिए हुए चुनाव में एन सिंह जनसंघ से लड़े। तीसरे नंबर पर रहे। 1971 में रामप्रकाश त्रिपाठी जनसंघ से मैदान में आए और दूसरे नंबर पर रहे। 1977 में भारतीय लोकदल के टिकट पर लड़कर सांसद बने। 1980 में वह जनता पार्टी के टिकट पर लड़े, नहीं जीते।

लोकसभा चुनाव में भाजपा का रिपोर्ट कार्ड
- 1984: ब्रम्हदत्त द्विवेदी, 38,916 वोट, चौथा स्थान
- 1989: रामप्रकाश त्रिपाठी, 90,717 वोट, तीसरा स्थान
- 1991: टीएन चतुर्वेदी, 1,11,419 वोट, दूसरा स्थान
- 1996: चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू, 2,19,039 वोट, विजेता बने
- 1998: चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू, 2,51,561 वोट, दूसरे नंबर पर
- 1999: अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस से गठबंधन के तहत भाजपा नहीं लड़ी
- 2004: रामानंद यादव, 1,12,349 वोट, तीसरे स्थान पर
- 2009: सुब्रत पाठक, 1,50,872 वोट, तीसरे स्थान पर
- 2014: सुब्रत पाठक, 4,69,257 वोट, दूसरे स्थान पर
- 2019: सुब्रत पाठक, 5,63,087 वोट, विजेता बने

भाजपा का विधानसभा क्षेत्र में रिपोर्ट कार्ड
कन्नौज सदर: 1991, 1993, 1996 में बनवारी लाल दोहरे, 2022 में असीम अरुण
तिर्वा: 1996, 2017, 2022 में कैलाश राजपूत विधायक बने
छिबरामऊ: 1993 और 2002 में रामप्रकाश त्रिपाठी। उनके बाद उनकी बेटी अर्चना पांडेय 2017 और 2022 में विधायक बनीं।
 

इत्रनगरी में क्लीन स्वीप कर इन्होंने रचा इतिहास

सुब्रत पाठक
- दो दशक से ज्यादा समय तक सपा का गढ़ बन चुके कन्नौज में पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव में नया इतिहास बना। कन्नौज जिला बनने के बाद इस सीट पर पहली बार भाजपा का खाता खुला। सुब्रत पाठक सांसद निर्वाचित हुए थे। उनसे पहले 1996 में चंद्रभूषण सिंह भाजपा से सांसद बने थे।

असीम अरुण
- आईपीएस अधिकारी रहे असीम अरुण सियासी दंगल में उतरने से ठीक पहले कानपुर के पुलिस कमिश्नर थे। 2022 के विधानसभा चुनाव के एलान वाले दिन ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। पार्टी ने सपा के गढ़ कन्नौज सदर से उतारा और बाजी मार ली।

अर्चना पांडेय
- छिबरामऊ सीट भी कभी सपा का गढ़ कहलाती थी। इस सीट से लगातार दूसरी बार विधायक बनीं अर्चना पांडेय पिछली सरकार में राज्यमंत्री थीं। इस सीट पर उनके पिता स्व. रामप्रकाश त्रिपाठी भी अलग-अलग समय पर भाजपा से दो बार सहित चार बार विधायक रहे हैं।

 कैलाश राजपूत
- पहले उमर्दा और अब तिर्वा के नाम से जिले की विधानसभा सीट से कैलाश राजपूत चौथी बार के विधायक हैं। इस बार लगातार दूसरी जीत मिली थी। उसके पहले एक बार भाजपा और एक बार बसपा से भी विधायक रह चुके हैं।
 
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2014 में सपा का भी इसी तरह था सियासी रसूख
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान इसी तरह का सियासी रसूख समाजवादी पार्टी का था। उस समय भी जिले की सभी सीट पर सपा का ही कब्जा था। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सभी सीट पर सपा को जीत मिली थी। सपा ने यहां क्लीन स्वीप किया था। उसी साल हुए उपचुनाव में डिंपल यादव निर्विरोध सांसद बनी थीं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कामयाबी हासिल की थी। उसके बाद हुए चुनाव से उसका ग्राफ गिरने लगा था।
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