बुंदेलों की शान का प्रतीक ऐतिहासिक कजली मेला अपनी अलग पहचान बनाए है। आल्हा ऊदल के शौर्य और वीरता के प्रतीक कजली मेले की शुरूआत आज से 835 साल पहले सन् 1182 में हुई थी। रक्षाबंधन पर्व के पहले पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण कर दिया था। इस युद्ध में बुंदेली वीरांगनाएं भी तलवार लेकर भीषण युद्ध में कूद पड़ी थी। रक्षाबंधन के दूसरे दिन युद्ध में विजय मिलने के बाद ही यहां कजली विसर्जन किया गया था, तब से लगातार महोबा में परेवा को रक्षाबंधन मनाने की परंपरा चली आ रही है। इसी दिन मेले का आयोजन होता है।
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काजली मेला, अलहा उदल की बहादुरी का प्रतीक है
महोबा के राजा परमाल के सैनिक वीर आल्हा ऊदल ने अपनी वीरता और शौर्य का पूरे देश में परचम फहराया। 12वीं शताब्दी में राजा परमाल ने अपने साले माहिल के कहने पर आल्हा ऊदल को राज्य से निकाल दिया था। राज्य से निकाले जाने के बाद नागपंचमी के दिन पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर चढ़ाई कर दी। चढ़ाई होने की भनक लगते ही आल्हा ऊदल और चाचा ताला सैय्यद साधु के वेश में महोबा आए।
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काजली मेला, अलहा उदल की बहादुरी का प्रतीक है
रक्षाबंधन के दिन जब राजा परमाल की पुत्री चंद्रवाल डोली में बैठकर कजली विसर्जन करने कीरत सागर सखियों के साथ जाने लगी तभी, पृथ्वीराज डाली लूटकर ले जाने लगा। यह देखकर रानी मल्हना तलवार लेकर रण में कूद पड़ी और सखियों के साथ युद्ध किया। दो दिन तक चले भीषण युद्ध में राजा परमाल का पुत्र रंजीत समेत सैकड़ों सैनिक मारे गए।
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काजली मेला, अलहा उदल की बहादुरी का प्रतीक है
आल्हा ऊदल ने पराक्रम दिखाते हुए पृथ्वीराज चौहान के छक्के छुड़ा दिए। रक्षाबंधन के दूसरे दिन पृथ्वीराज पराजित होकर भाग गया। तब चंद्रवाल ने सखियों के साथ कीरत सागर में भुजरिया विसर्जित की। चंदेली राजाओं और दिल्ली नरेश के बीच हुए भीषण युद्ध का मूक गवाह ऐतिहासिक कीरत सागर तट है। तब से यहां कजली मेले का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले मेले में विभिन्न प्रांतों से लाखों की संख्या में लोग मेले में आते है।
मामा की चुगली पर राज्य से निकाले गए थे आल्हा ऊदल
चंदेली राजा परमाल के साले और आल्हा ऊदल के मामा माहिल ने राजा परमाल से आल्हा-ऊदल की चुगली कर दी। तब राजा ने ऊदल से घोड़ा और तलवार देने की बात कही। घोड़ा और तलवार देने से इनकार करने पर आल्हा ऊदल को राज्य से निकाल दिया गया। तब दोनों कन्नौज के राजा जयचंद्र के यहां शरण ली, लेकिन महोबा में संकट आने पर उन्होंने यहां आकर युद्ध किया।