कानपुर में आयकर विभाग में फैले भ्रष्टाचार की एक और बानगी देखिए। अफसरों ने आंखों के सामने से गुजरे करोड़ों रुपये के हवाला रैकेट की जड़ें ढूंढने के बजाय उस पर मिट्टी डाल दी। न तो रकम इधर से उधर करने वाले कारोबारी पर शिकंजा कसा और न ही रकम हासिल करने वालों पर।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में आयकर अफसरों के इस भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। कैग ने देश के 13 राज्यों के आयकर विभाग से संबंधित 260 प्रकरणों को अपनी जांच का हिस्सा बनाया।
इनमें दो मामले कानपुर से संबंधित पाए गए। एक मामला 156 करोड़ रुपये के हवाला रैकेट से जुड़ा है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में प्रधान आयकर आयुक्त (सेंट्रल सर्किल) के निर्देश पर एक कारोबारी के यहां छापा मारा गया।
बड़े पैमाने पर नकदी, ज्वैलरी, संपत्तियों के दस्तावेज व लॉकर मिले। दो साल तक इस प्रकरण की जांच चली। इसके बाद सिर्फ मामूली टैक्स चोरी की रकम जमा कराई गई। कैग ने जब इस प्रकरण का आडिट किया तो पता चला कि कारोबारी हवाला रैकेट से जुड़ा है।
छापे के दौरान मिले दस्तावेजों, नकदी आदि से इस बात की पुष्टि हुई। ऑडिट के दौरान बाकायदा कारोबारी की डायरी से अलग-अलग कुछ खास नंबर वाली नोटों की गड्डियों का जिक्र मिला, जिन्हें दर्जन भर से अधिक लोगों को भेजा गया था।
कुल 156 करोड़ रुपये अलग-अलग जगह भेजे गए। इनका कोई हिसाब किताब नहीं था। बावजूद किसी भी पक्ष को जांच का हिस्सा नहीं बनाया गया। न किसी से पूछताछ न ही कर का निर्धारण।
न तो कारोबारी से ये पूछने की जहमत उठाई गई कि रकम आई कहां से? राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने वाले प्रकरण की सूचना किसी एजेंसी को भी नहीं दी गई। चूंकि इस आय को अघोषित नहीं किया गया। इसलिए 64.29 करोड़ रुपये का टैक्स भी नहीं मिला।
सरेंडर की आय पर नहीं जमा कराया टैक्स
इसी तरह का एक प्रकरण और है। एक कारोबारी ने 201.99 करोड़ रुपये कैश लोन दिखाया, जबकि लोन कभी कैश में नहीं होता। यानी लोन हमेशा बैंक से उसके किसी खाते में आता है। असेसमेंट हुआ तो उल्टी सीधी गणित भिड़ाकर 86.99 करोड़ रुपये आय में जोड़े गए।
दलील दी गई कि कारोबारी ने 115 करोड़ रुपये की आय सरेंडर कर दी, जबकि कारोबारी ने अपने आयकर रिटर्न में इतनी रकम दिखाई ही नहीं। यानी अफसरों ने कभी उसका रिटर्न चेक ही नहीं किया। दरअसल कारोबारी 115 करोड़ रुपये का टैक्स हजम कर गया और अफसरों ने आंख मूंद ली।
अधिकारियों की मंशा पर सवाल
कैग ने इन दोनों प्रकरणों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। स्पष्ट तौर पर लिखा है कि अफसरों की मंशा कभी भी मामले को सही अंजाम तक पहुंचाने की नहीं रही। पूरी कार्यशैली भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है। कैग ने अपनी यह रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को भेजी है। जानकार बताते हैं कि इस तरह के गंभीर प्रकरण पर अफसर के भविष्य पर वित्त मंत्रालय ही फैसला लेता है।