अब चूंकि इस प्रोस्टेट कैंसर का पता चल गया है तो वैज्ञानिक इसका इलाज भी ढूंढ पाएंगे। बायोलॉजिकल साइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग (बीएसबीई) विभाग की सीनियर प्रोफेसर डॉ. बुशरा अतीक को अवॉर्ड देने का एलान रविवार को इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर ने किया।
उन्होंने बताया कि यह अवॉर्ड इंस्टीट्यूट के पूर्व छात्र रंगाराजन वेलामोरे ने रिसर्च के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों के लिए शुरू कराया था। इस अवॉर्ड के तहत पांच लाख रुपये और प्रशस्ति पत्र दिया जाएगा।
प्रोस्टेट कैंसर केवल पुरुषों में होता है। ज्यादातर पीड़ित 50 या इससे अधिक आयु वर्ग के होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि धीरे-धीरे यह समस्या कब कैंसर का रूप ले लेती है, यह कोई भी पीड़ित नहीं समझ पाता। डॉक्टर इसका असर कम करने के लिए दवा जरूर चलाते हैं मगर यह कारगर साबित नहीं होती है। कारण, अभी तक प्रोस्टेट में ट्यूमर उत्पन्न होने का कारण नहीं पता चल पाया था।
इससे न तो सही इलाज संभव हो पा रहा था और न ही इसकी असली दवा बनी थी। प्रो. बुसरा ने बताया कि प्रोस्टेट में मौजूद स्पिंक जीन ट्यूमर का रूप धारण कर लेता है जिसके चलते कैंसर होता है। आगे चलकर यही जीन इंसान के फेफड़े और पैनक्रिएटिक, छाती और ओवैरियन कैंसर में तब्दील हो जाती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह स्पिंक जीन ईजेडएच-2 प्रोटीन से तैयार होते हैं।