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Kanpur News: आईआईटी ने पल्सर की दूरी मापने की नई तकनीक खोजी

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कानपुर। आईआईटी कानपुर और नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अहम सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने पल्सर (आवधिक रेडियो तरंगें छोड़ने वाले तारे) की दूरी मापने का एक नया और अधिक सटीक तरीका विकसित किया है। यह शोध प्रोबिंग द मॉर्फोलॉजी ऑफ द गम नेबुला यूजिंग पल्सर ऑब्जर्वेबल्स एंड ए नॉवेल डिस्टेंस एस्टिमेशन मेथड ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की ओर से प्रकाशित जर्नल मंथली नोटिसेस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ है।
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यह तकनीक आईआईटी के भौतिकी विभाग व स्पेस (स्पेस, प्लैनेटरी एंड एस्ट्रोनॉमिकल साइंसेज एंड इंजीनियरिंग) और नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स पुणे के खगोल वैज्ञानिकों ने विकसित की है। आईआईटी के प्रो. पंकज जैन ने बताया कि इस अध्ययन में एनसीआरए के डॉ. आशीष कुमार और प्रो. अविनाश ए देशपांडे भी शामिल रहे। आमतौर पर किसी तारे की दिशा का पता लगाना आसान होता है, लेकिन उसकी असली दूरी मापना खगोल विज्ञान में चुनौती रही है। अब तक त्रिकोणमितीय पैरालैक्स जैसी तकनीक का उपयोग किया जाता था, जो केवल पास के तारों पर ही कारगर होती थी।

नई विधि में वैज्ञानिकों ने पल्सर से आने वाली रेडियो तरंगों पर अंतरिक्ष में मौजूद मुक्त इलेक्ट्रॉनों के प्रभाव का अध्ययन किया। अंतरिक्ष पूरी तरह खाली नहीं होता, उसमें गैस और इलेक्ट्रॉनों का बारीक जाल फैला होता है, जिसे अंतरतारकीय माध्यम कहा जाता है। यही माध्यम रेडियो तरंगों की गति और स्वरूप को प्रभावित करता है। वैज्ञानिकों ने दो प्रभावों डिस्पर्शन मेजर और स्कैटर ब्रॉडनिंग का संयुक्त विश्लेषण कर दूरी का अनुमान लगाने की नई तकनीक विकसित की।
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जैसे-जैसे पल्सर हमसे दूर होता है, उसकी रेडियो तरंगों पर इन प्रभावों की तीव्रता बदलती है। इन्हीं बदलावों के आधार पर दूरी का अधिक सटीक आकलन संभव हुआ है। शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण आकाशगंगा के दक्षिणी हिस्से में स्थित विशाल गैसीय क्षेत्र गम नेबुला की दिशा में मौजूद पल्सरों पर किया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तरीका भविष्य में सैकड़ों पल्सरों की दूरी मापने और आकाशगंगा के इलेक्ट्रॉन घनत्व मॉडल को और सटीक बनाने में उपयोगी होगा।
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