'कजली मेला' उत्तर भारत का मशहूर ग्रामीण मेला है। इस मेले का इतिहास 835 साल पुराना बताया जाता है। आप भी जानिए क्या है इस मेले की खासियत...
कीरत सागर के तटपर 7 दिन रहती है मेले की धमक
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उत्तर भारत का मशहूर ग्रामीण कजली मेला आज भी अपनी पहचान कायम रखता है। हालांकि इस मेले में ग्रामीण ही जुटते हैं। लेकिन ये भीड़ हर साल बढ़ती जा रही है। बढ़ी वजह ये है कि लोग इस मेले के एतिहासिक महत्व को आज भी बरकरार रखने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में कीरत सागर के तटपर लगने वाले ऐतिहासिक मेले की धमक दूर-दूर तक है। इसलिए दूर दराज के दुकानदार एक सप्ताह पहले से ही यहां आकर अपना डेरा जमा लेते हैं। इससे उनकी कमाई हो जाती है।
वीर रस गायन से फड़क उठती है बुंदेलों की नसें
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सबसे खास बात ये है कि मेले में बुंदेली कार्यक्रमों का प्रस्तुतिकरण होता है। इनमें आल्हा-उदल की वीरता का गायन होता है। 835 साल से बुंदेली समाज की इन्हीं वीर रस से ओतप्रोत गायनों को सुनकर पला-बढ़ा है। सब कुछ इतना जीवंत लगने लगता है कि वीर रस गायन से ही बच्चे-बच्चे का नसें फड़कने लगती है।
इसके अलावा कवि सम्मेलन, भजन संध्या, संगीत संध्या जैसे कार्यक्रमों को भी इस बार शामिल किया गया है। दिन में आल्हा मंच पर बुंदेली और लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। वहीं मेला संरक्षण समिति द्वारा दूर दराज से आए कलाकार कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे।
835 साल पुराने ऐतिहासिक कजली मेले का बेसब्री से होता है इंतजार
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आठ अगस्त से शुरू हो रहे कजली मेले का समापन 14 अगस्त को होगा। जिला प्रशासन भी इस दफा मेले को नया रूप देने की तैयारी में लगा हुआ है। पिछले साल की तुलना में इस साल पालिका प्रशासन ने मेले का बजट तीन लाख ज्यादा स्वीकृत किया है।
835 साल पुराने ऐतिहासिक कजली मेले को देखने के लिए आज भी लोग इंतजार करते हैं। कजली मेले में ज्यादातर शादी के बाद बाहर पहुंची महिलाएं अपनी पति और परिजनों के साथ कजली मेले में अवश्य शिरकत करती हैं। कजली मेले के साथ साथ रक्षाबंधन त्योहार भी महिलाओं का मायके में हो जाता है।
-कजली मेले के लिए 20 लाख रुपये का बजट स्वीकृत
-ऐतिहासिक मेले में कई जिलों की आती है भीड़
-आठ अगस्त से 14 अगस्त तक चलेगा कजली मेला
फोटो 26 एमएएचपी 6 परिचय-कीरत सागर के तट में बना आल्हा मंच
...तो ऐसे शुरू हुआ था कजली मेला
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सन् 1182 में राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि 1400 सखियाें के साथ भुजरियों के विसर्जन के लिए कीरत सागर जा रही थीं। रास्ते में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडा राय ने आक्रमण कर दिया था। पृथ्वीराज चौहान की योजना चंद्रावलि का अपहरण कर उसका विवाह अपने बेटे सूरज सिंह से कराने की थी। यह वह दौर था जब आल्हा ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया था और वह अपने मित्र मलखान के पास कन्नौज में रह रहे थे।
रक्षाबंधन के दिन जब राजकुमारी चंद्रावल अपनी सहेलियों के साथ भुजरियां विसर्जित करने जा रही थी तभी पृथ्वीराज की सेना ने उन्हें घेर लिया। आल्हा ऊदल के न रहने से महारानी मल्हना तलवार ले स्वयं युद्ध में कूद पड़ी थी। दोनों सेनाओं के बीच हुए भीषण युद्ध में राजकुमार अभई मारा गया और पृथ्वीराज सेना राजकुमारी चंद्रावल को अपने साथ ले जाने लगी।
अपने राज्य के अस्तित्व व अस्मिता के संकट की खबर सुन साधु वेश में आये वीर आल्हा ऊदल ने अपने मित्र मलखान के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। चंदेल और चौहान सेनाओं की बीच हुये युद्ध में कीरतसागर की धरती खून से लाल हो गई। युद्ध में दोनों सेनाओं के हजारों योद्धा मारे गये।
राजकुमारी चंद्रावल व उनकी सहेलियां अपने भाईयों को राखी बांधने की जगह राज्य की सुरक्षा के लिये युद्ध भूमि में अपना जौहर दिखा रही थी। इसी वजह से भुजरिया विसर्जन भी नहीं हो सका। तभी से यहां एक दिन बाद भुजरिया विसर्जित करने व रक्षाबंधन मनाने की परंपरा है। महोबा की अस्मिता से जुड़े इस युद्ध में विजय पाने के कारण ही कजली महोत्सव विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सावन माह में कजली मेला के समय गांव देहातों में लगने वाली चौपालों में आल्हा गायन सुन यहां के वीर बुंदेलों में आज भी 1100 साल पहले हुई लड़ाई का जोश व जुनून ताजा हो जाता है।
आल्हा-ऊदल की वीरगाथा में कहा गया है 'बड़े लड़इया महुबे वाले, इनकी मार सही न जाए..!' आल्हा-ऊदल की वीरगाथा के प्रतीक ऐतिहासिक कजली मेले को यहां 'विजय उत्सव' के रूप में मनाने की परम्परा आज भी जीवित है।