कानपुर के बिल्हौर स्थित चौबेपुर में कोरोना काल में अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन की किल्लत के कारण क्षेत्र के दर्जनों मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ गए। वहीं, लाखों रुपये की लागत से बने स्वास्थ्य उपकेंद्रों की बदहाली सिस्टम की नाकामी की पोल खोल रहे हैं।
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ग्रामीणों को नजदीक ही स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से गांव-गांव बनवाए गए ज्यादातर केंद्र अब जच्चाबच्चा टीकाकरण या अन्य चिकित्सकीय सेवाएं मुहैया कराने लायक भी नहीं हैं। एक दशक पूर्व बने इन केंद्रों पर या तो ताले लटक रहे हैं या फिर इनमें गंदगी व खरपतवार उग आए हैं।
चौबेपुर क्षेत्र में निर्मित कराए गए 31 स्वास्थ्य उपकेंद्रों में से 50 फीसदी का भी उपयोग नहीं हो रहा है। ये अब नशेबाजों और जुआरियों का अड्डा बने हुए हैं। कुछ उपकेंद्रों का ग्रामीण निजी उपयोग कर रहे हैं। कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर में बेकार साबित हुए ये केंद्र तीसरी लहर में भी किसी काम आएंगे, इसकी न कोई उम्मीद है और न ही स्वास्थ्य विभाग ने कोई योजना इनके सुधार के लिए बनाई है।
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कभी भी गिर सकता निगोहा स्वास्थ्य उपकेंद्र
चौबेपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से लगभग आठ किमी दूर स्थित निगोहा स्वास्थ्य उपकेंद्र के निर्माण का उद्देश्य भी ग्रामीणों को नजदीकी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही व आला अधिकारियों की अनदेखी से भवन बदहाली का शिकार है।
गांव की पूर्व प्रधान उषा सिंह चंदेल ने बताया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में ग्राम पंचायत से एक कमरे का जीर्णोद्धार कराया था। भवन का बाकी का हिस्सा पूरी तरह से जीर्णशीर्ण व जर्जर स्थिति में है। बताया कि यदि समय रहते स्वास्थ्य केंद्र की मरम्मत करा दी जाती तो लाखों रुपये कीमत के भवन को किसी भी तरह से उपयोग में लाया जा सकता था।
बिरोहा उपकेंद्र बना नशेबाजों, जुआरियों का अड्डा
बिरोहा गांव का स्वास्थ्य उपकेंद्र भी ग्रामीणों को मुंह चिढ़ा रहा है। गांव से दूर बने इस केंद्र तक पहुंचने के लिए रास्ते के नाम पर एक पगडंडी है। एकांत में बने केंद्र पर कभी भी कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं बैठा। गांव निवासी राजेंद्र दीक्षित, मनीष मिश्रा, मैकू लाल कुरील, ऋषभ व सुघर यादव आदि ने बताया कि यहां कभी भी टीकाकरण का काम नहीं हुआ।
मौजूदा समय में यह खस्ताहाल केंद्र दिन के समय जहां जुआरियों, नशेबाजों का अड्डा बना रहता है, वहीं रात में बदमाशों की पनाहगाह है। आशा कार्यकर्ता मिथिलेश के अनुसार जर्जर केंद्र पर बैठना खतरे से खाली नहीं है, इसलिए वह गांव में ही किसी के घर बैठकर टीकाकरण का काम निपटाती हैं।
मरखरा उपकेंद्र भी जर्जर, हमेशा रहता है बंद
ब्लॉक मुख्यालय से लगभग छह किमी दूर स्थित मरखरा स्वास्थ्य उपकेंद्र की हालत बेहद जर्जर है। गांव निवासी धीरू पाठक, कल्लू गुप्ता, जितेंद्र पाल, श्यामू पासवान व विनय पाठक आदि ने बताया कि कस्बा स्थित सीएचसी से दूरी अधिक होने से लोगों को इस उपकेंद्र से तमाम उम्मीदें थीं, लेकिन यह किसी के काम नहीं आया।
कहा कि केंद्र पर स्वास्थ्यकर्मियों के न आने से यहां हमेशा ताला ही बंद रहा। कभी सफाई न कराए जाने से यहां आसपास गंदगी का अंबार लगा रहता है। यह केंद्र भी नशेबाजों व जुआरियों का अड्डा बनकर रह गया है। देखरेख व मरम्मत के अभाव में स्वास्थ्य केंद्र किसी भी समय धराशायी हो सकता है।
विशुनपुर अस्पताल के खिड़की-दरवाजे चोर ले गए
विशुनपुर गांव का स्वास्थ्य उपकेंद्र भी लाखों रुपये खर्च होने के बाद अनुपयोगी ही साबित हुआ। देखरेख के अभाव में खस्ताहाल हुए इस केंद्र के बाबत गांव निवासी संजय दीक्षित, राजकशोर, आयुष शुक्ला, विनोद आदि ने बताया कि लगभग एक दशक पहले बने उप स्वास्थ्य केंद्र पर कुछ माह तक ही आशा कार्यकर्ता और एएनएम द्वारा टीकाकरण का काम किया गया।
लेकिन, सालभर के भीतर ही केंद्र में ताला लग गया। देखरेख व मरम्मत के अभाव में भवन जर्जर हालात में है। अनदेखी के चलते दरवाजे व खिड़कियां चोर उखाड़कर ले गए। अब यह केंद्र केवल अराजकतत्व की शरणस्थली बन गया है।