कानपुर में ईद के तीन दिनों तक मेले लगते हैं। ईद के दिन नई सड़क पर मेला लगता है। ईद के दूसरे दिन चमनगंज में लगने वाले मेले को टर्र का मेला और तीसरे दिन इफ्तिखाराबाद में लगने वाले मेले को पर्र का मेला कहा जाता है। पिछले 120 सालों से यहां यह मेले लगते हैं।
देश में और कहीं भी इस तरह के नाम से मेला नहीं लगता। बच्चों के लिए झूले, खिलौनों की दुकानें और खाने पीने की दुकानें लगती हैं। इस मेले की कोई पारंपरिक या धार्मिक वजह नहीं है, बल्कि ईद के दिन मनाई जाने वाली खुशियों में बच्चों के मनोरंजन के लिए इसकी शुरुआत की गई थी, जो धीरे धीरे ऐतिहासिक हो गई।
शहर की बड़ी ईदगाह के नाम से मशहूर बेनाझाबर स्थित ईदगाह करीब 108 साल पुरानी है। ईद और बकरीद में इस ईदगाह के अंदर करीब तीन लाख और बाहर करीब दो लाख लोग नमाज पढ़ते हैं। बड़ी ईदगाह के मुतवल्ली माहे आलम जफर ने बताया कि उनके पूर्वजों ने इस ईदगाह की तामीर कराकर वक्फ किया था। यहां 37 सालों तक इमाम कारी मोहम्मद इलाही ने नमाज पढ़ाई। उनके इंतकाल के बाद मुफ्ती शकील बड़ी ईदगाह के इमाम हैं।
शहर की दूसरी बड़ी ईदगाह दक्षिणी शहर बाबूपुरवा में बगाही ईदगाह है। 1958 में इसे अब्दुल कय्यूम ने बनवाया था। उनके दामाद अब्दुल हमीद यहां के मुतवल्ली बने। दो साल पहले उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी के उनके पुत्र मोहम्मद आसिफ निभा रहे हैं। व्यवस्थापक मोहम्मद अकील शानू ने बताया कि ईद और बकरीद पर दक्षिण क्षेत्र के करीब ढाई लाख लोग नमाज के लिए आते हैं। यहां इमाम कारी सैयद मोहम्मद अहमद नमाज पढ़ाते हैं।
यह एक ऐसी जगह है, जहां ईदगाह, कर्बला, कब्रिस्तान और मस्जिद एक साथ बनी है। जाजमऊ 150 फिट रोड स्थित दादामियां ईदगाह में भी लाखाें की संख्या में लोग नमाज अदा करते हैं। मुतवल्ली हाजी अबरार ने बताया कि यह 200 साल से अधिक पुरानी ईदगाह है। इस वजह से तामीर की सही तारीख की जानकारी नहीं है। यहां कारी हसीब अख्तर नमाज पढ़ाते हैं।