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परंपराओं के साथ बदल गई ईद, जानिए ऐतिहासिक ईदगाह और 120 साल पुराने टर्र-पर्र मेले के बारे में

Sat, 01 Jun 2019 04:14 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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बड़ी ईदगाह - फोटो : अमर उजाला
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मुस्लिम समुदाय के सबसे बड़े त्योहार ईद-उल-फित्र को मनाने का तरीका भी समय के साथ बदल चुका है। आधुनिकता की छाप, संपन्नता और भारतीय संस्कृति का बड़ा प्रभाव शहर की ईद पर दिखने लगा है। कानपुर शहर की ऐतिहासिक ईदगाहें और ईद पर लगने वाले खास टर्र और पर्र के मेले भी इस त्योहार की परंपराओं की याद दिलाते हैं। ईद की नमाज और सेंवई को छोड़कर ईद को मनाने का तरीका बिल्कुल बदल चुका है।
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पहले ईद पर बच्चों में इस बात की खुशी होती थी कि बड़े उन्हें ईदी के तौर पर रुपये देंगे, जिन्हें वे खर्च करेंगे। अब ईद पर रुपये के साथ ही अपने से छोटों को गिफ्ट, चॉकलेट देने का चलन बढ़ा है। संपन्न परिवार अपने बच्चों को ईदी के तौर पर कार, बाइक तक देते हैं। होटलों में खाने की दावतें दी जाती हैं।

सिर्फ ईदी ही नहीं, बहुत सी परंपराओं में बदलाव आया है। ईद के बाद रिश्तेदारों के घर जाकर ईद की मुबारकबाद देने वाली परंपराओं में काफी कमी आई है। यहां तक नमाज के बाद एक दूसरे से गले लगकर मुबारकबाद देने के तरीकों पर बहस होने लगी है।
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इस ईदगाह के अंदर करीब तीन लाख और बाहर करीब दो लाख लोग नमाज पढ़ते हैं

कानपुर में ईद के तीन दिनों तक मेले लगते हैं। ईद के दिन नई सड़क पर मेला लगता है। ईद के दूसरे दिन चमनगंज में लगने वाले मेले को टर्र का मेला और तीसरे दिन इफ्तिखाराबाद में लगने वाले मेले को पर्र का मेला कहा जाता है। पिछले 120 सालों से यहां यह मेले लगते हैं।

देश में और कहीं भी इस तरह के नाम से मेला नहीं लगता। बच्चों के लिए झूले, खिलौनों की दुकानें और खाने पीने की दुकानें लगती हैं। इस मेले की कोई पारंपरिक या धार्मिक वजह नहीं है, बल्कि ईद के दिन मनाई जाने वाली खुशियों में बच्चों के मनोरंजन के लिए इसकी शुरुआत की गई थी, जो धीरे धीरे ऐतिहासिक हो गई।

शहर की बड़ी ईदगाह के नाम से मशहूर बेनाझाबर स्थित ईदगाह करीब 108 साल पुरानी है। ईद और बकरीद में इस ईदगाह के अंदर करीब तीन लाख और बाहर करीब दो लाख लोग नमाज पढ़ते हैं। बड़ी ईदगाह के मुतवल्ली माहे आलम जफर ने बताया कि उनके पूर्वजों ने इस ईदगाह की तामीर कराकर वक्फ किया था। यहां 37 सालों तक इमाम कारी मोहम्मद इलाही ने नमाज पढ़ाई। उनके इंतकाल के बाद मुफ्ती शकील बड़ी ईदगाह के इमाम हैं।
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यह 200 साल से अधिक पुरानी ईदगाह है

शहर की दूसरी बड़ी ईदगाह दक्षिणी शहर बाबूपुरवा में बगाही ईदगाह है। 1958 में इसे अब्दुल कय्यूम ने बनवाया था। उनके दामाद अब्दुल हमीद यहां के मुतवल्ली बने। दो साल पहले उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी के उनके पुत्र मोहम्मद आसिफ निभा रहे हैं। व्यवस्थापक मोहम्मद अकील शानू ने बताया कि ईद और बकरीद पर दक्षिण क्षेत्र के करीब ढाई लाख लोग नमाज के लिए आते हैं। यहां इमाम कारी सैयद मोहम्मद अहमद नमाज पढ़ाते हैं।
 
यह एक ऐसी जगह है, जहां ईदगाह, कर्बला, कब्रिस्तान और मस्जिद एक साथ बनी है। जाजमऊ 150 फिट रोड स्थित दादामियां ईदगाह में भी लाखाें की संख्या में लोग नमाज अदा करते हैं। मुतवल्ली हाजी अबरार ने बताया कि यह 200 साल से अधिक पुरानी ईदगाह है। इस वजह से तामीर की सही तारीख की जानकारी नहीं है। यहां कारी हसीब अख्तर नमाज पढ़ाते हैं।
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