गंगा किनारे की अवैध ग्लू भट्ठियों में निकलने वाली चर्बी से नकली देशी घी बनाने का धंधा चल रहा है। यहां के धंधेबाजों के तार आगरा और गुजरात तक जुड़े हैं। पुलिस, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खाद्य विभाग के कई अफसरों पर भी इस चर्बी की पर्त चढ़ी है, इसलिए इन भट्ठियों पर कार्रवाई नहीं होती।
चर्बी से बनने वाला नकली देशी घी आस-पास के जिलों ही नहीं, बल्कि बुंदेलखंड, पूर्वांचल से लेकर बिहार तक सप्लाई किया जाता है। ज्यादा मुनाफे के चलते ग्रामीण क्षेत्रों के दुकानदार भी ऐसे नुकसानदायक घी को खूब बेचते हैं।
सूत्रों ने बताया कि वाजिदपुर और प्योंदी में गंगा किनारे अवैध रूप से चल रहीं ग्लू भट्ठियों में बनने वाली ‘तेजाबी चर्बी’ शहर में 10 से ज्यादा नकली देशी घी बनाने वालों, 100 से ज्यादा बेकरी वालों को बेची जाती है। इस धंधे से जुड़े सूत्रों के अनुसार धंधेबाज इस चर्बी को पुन: खौलाकर ठंडा होने के बाद इसमें रिफाइंड, शुद्ध देशी घी और एसेंस मिलाते हैं। थोक वालों को चर्बी 20 रुपये किलो और फुटकर वालों को 40 रुपये किलो बेची जाती है।
जाजमऊ में तोड़ी ग्लू की 14 भट्ठियां : एसीएम
जाजमऊ में रविवार को एसीएम भानू प्रताप शुक्ला की अगुवाई में अवैध भट्ठियां तोड़ने का अभियान चला। उन्होंने बताया कि गंगा किनारे अवैध रूप से चल रही 14 ग्लो भट्ठियां तोड़ी गई हैं। कहा कि जैविक खाद की भट्ठियांे में कुछ ने स्वीकृति होने की बात कही है। सोमवार को क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी को उनकी सत्यता की जांच करने को भेजूंगा। इसके बाद अवैध भट्ठियां हटवाई जाएगी।
ऐसे कराएं खाद्य पदार्थों की जांच
कोई भी उपभोक्ता कलक्ट्रेट स्थित खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग के दफ्तर में जाकर किसी भी खाद्य पदार्थ की जांच करा सकता है। अभिहित अधिकारी एसएच आबिदी के अनुसार उपभोक्ता सील पैक या खुला हुआ खाद्य पदार्थ ला सकता है। इसकी जांच के लिए उन्हें ट्रेजरी में एक हजार रुपये जमा कर उसकी रसीद लाने के साथ ही एक प्रार्थनापत्र भी देना होगा। विभाग उसकी जांच लैब से कराएगा। जांच रिपोर्ट 15 से 20 दिन में आ जाएगी, तब उपभोक्ता दफ्तर आकर इसे प्राप्त कर सकता है।
ऐसे तैयार करते हैं नकली देशी घी
एक किलो नकली देशी घी तैयार करने में लगभग आधा किलो चर्बी, 300 ग्राम रिफाइंड, 200 ग्राम असली देशी घी और एसेंस (देशी घी की सुगंध वाला केमिकल) मिलाया जाता है। इस प्रकार तैयार नकली देशी घी को ब्रांडेड कंपनियों के डिब्बों में पैककर बाजार में बेचा जाता है।
डेढ़ सौ रुपये में नकली देशी घी
चर्बी से एक किलो नकली देशी घी बनाने में लगभग 10 रुपये की चर्बी, 70 रुपये का देशी घी, 15 रुपये का रिफाइंड खर्च होता है। एसेंस, पैकिंग, मजदूरी, भाड़ा आदि मिलाकर लगभग 135 से 150 रुपये प्रति किलो लागत आती है। नकली देशी घी का धंधा करने वाले लगभग 100 रुपये प्रति किलो मुनाफे पर इसे चुनिंदा थोक दुकानदारों के माध्यम से फुटकर विक्रेताओं तक पहुंचाते हैं।
यहां बेकरियों में चर्बी का इस्तेमाल
जाममऊ, बेकनगंज, परेड, कर्नलगंज, मछरिया, रावतपुर गांव, बाबूपुरवा, बेगमपुरवा, मुंशीपुरवा, रत्तूपुरवा, गांधी नगर, चमनगंज की कई बेकरियों में भी चर्बी का इस्तेमाल होता है। तमाम लोग घरों में ही चर्बी से पेटीज, क्रीमरोल, जीरा आदि तैयार कर बेकरियों में थोक में बेचते हैं।
पेटीज, क्रीमरोल बनाने में इस्तेमाल
ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में घनी आबादी वाले मोहल्लों से लेकर नवविकसित क्षेत्रों के तमाम बेकरी संचालक धड़ल्ले से चर्बी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस धंधे से जुड़े लोगों की मानें तो पेटीज, जीरा, क्रीमरोल आदि बनाने में रिफाइंड या वनस्पति की जगह चर्बी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे चमक ज्यादा आती है। कुछ धंधेबाज टोस्ट, बिस्किट, पाव आदि बनाने में भी चर्बी खपाते हैं।
तेजाबी चर्बी से कैंसर तक की आशंका
तेजाबी चर्बी से बनने वाले देशी घी से उल्टी, दस्त, एनीमिया, चर्मरोग हो सकते हैं। चर्बी में केमिकल रिएक्शन से फीनॉल एवं एपॉक्सी बन जाता है। इसमें स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदायक ट्रांसफैट, एल्केनॉल भी होते हैं। ऐसी चर्बी आंतों में जाने से आंतों में घाव, अल्सर से लेकर कैंसर तक हो सकता है। तब इसका सेवन रोकने के बावजूद मरीज को ठीक होने में बहुत समय लग जाता है। -डॉ. आरती लालचंदानी, अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल एसोसिएसन