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खेती करेंगे, दुकान चलाएंगे पर बाहर नहीं जाएंगे

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अहमदाबाद से कानपुर पहुँची श्रमिक स्पेशल ट्रेन-स्टेशन पर बस का इंतजार करते यात्री-फ़ोटो-गौरव-संवा?
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सेंट्रल स्टेशन पर शनिवार को अहमदाबाद, मुंबई से ट्रेनों में आए मजदूरों ने आपबीती सुनाई। बताया कि रुपये खत्म हो गए थे। होटल बंद थे और घर में खाना बनाने के लिए बर्तन तक नहीं थे। इतना डर गए हैं कि गांव में खेती करेंगे, दुकान भी चला लेंगे पर अब दोबारा बाहर काम करने नहीं जाएंगे।
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गुजरात-महाराष्ट्र से आईं तीन ट्रेनों में 2094 मजदूरों को सेंट्रल पर उतारा गया। इन्हें खाना-पानी देकर थर्मल स्क्रीनिंग कराई। अहमदाबाद से आई ट्रेन में 1600 श्रमिक, मुंबई से लखनऊ जाने वाली ट्रेन में कानपुर में 316 और अहमदाबाद से गोंडा जाने वाली ट्रेन में सेंट्रल पर 178 मजदूर उतरे। यहां से 88 रोडवेज बसों से 38 जिलों के मजदूरों को रवाना किया गया। इन बसों में खाने के पड़े पैकेट तक साफ नहीं किए गए थे। धूल-कालिख तक जमा थी।
भगवान का शुक्र है कि लौट आया। दिक्कत में एहसास होता है कि बड़े शहरों की चकाचौंध और रुपया पैसा सब धरा रह जाता है। इस बीमारी ने गांव की तरफ खींचा। खेतों करूंगा, छोटी मोटी दुकान चलाऊंगा लेकिन गांव छोड़कर नहीं जाऊंगा।
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- शुभम भदौरिया, फर्रुखाबाद
गुजरात में रंग बनाने वाली कंपनी के कारखाने में काम करता था। जब तक गांव से आता जाता था तो सेठ भी कद्र करता था। इस बीमारी ने उसने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। जीवन में बहुत दुश्वारियां झेलीं लेकिन इस बार गुजरात ने नर्क का एहसास कराया, कभी लौटकर नहीं जाऊंगा।
- शिवम सिंह, शाहजहांपुर
अहमदाबाद अपने रिश्तेदारों के यहां घूमने गई थी। लॉकडाउन में वहां फंस गई। एक तो जिनका घर था, वह लोग स्वयं इस महामारी से परेशान थे। ऊपर से हम लोग भी उनके घर में टिके हुए थे। पैदल नहीं आ सकते थे। रोज प्रार्थना करते थे कि किसी तरह ट्रेन चल जाए।
- गीता, कौशांबी
रिश्तेदार की तबीयत खराब थी। उनको देखने अहमदाबाद गई थी लेकिन वहां संक्रमण काल में फंस गईं। सभी भयभीत थे। पास पड़ोस के लोग एक दूसरे से बात नहीं करते थे। एक के बाद एक लॉकडाउन बढ़ रहा था और हमारी दिलों की धड़कनें भी। यहां घर में भी सब परेशान हो रहे थे।
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- सुनीता, लखनऊ
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