आज धनतेरस का पर्व है। सोम प्रदोष के साथ-साथ अमृतसिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। सोमवार सूर्योदय से लेकर रात 8:33 बजे तक हस्त नक्षत्र (चंद्रमा का नक्षत्र) होने के कारण खरीदारी का शुभकाल रहेगा।
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इस अवधि में गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, बर्तन, वाहन, सोना-चांदी और घर की उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी फलदायी रहेगी। रात 11:45 बजे से भद्रा लग जाएगी। भद्रा काल में खरीदारी नहीं होती है।
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धनतेरस की पूजा ऐसे करें
धनतेरस का पूजा मुहूर्त दिनभर है। पूजा के लिए नया बर्तन, सोने या चांदी का सिक्का एक पाटे पर रख लें। इसके बाद चंदन, केसर, धूप, हल्दी, दूर्वा, शमी पत्र, घी और गुड़ या मिष्ठान से सोने या चांदी के सिक्के का और बर्तन का पूजन करें। यहां पर बर्तन का पूजन इसलिए विशेष है क्योंकि समुद्र मंथन में कलश के साथ माता लक्ष्मी प्रकट हुई थी।
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धनतेरस के दिन बर्तन का पूजन करने से सुख शांति, अन्न, धन की वृद्धि होती है। वहीं, सोने या चांदी के सिक्के में प्रत्यक्ष लक्ष्मी का वास माना जाता है। इस कारण सोने-चांदी के सिक्कों को पंचामृत में स्नान कराकर उस पर केसर, हल्दी, कुमकुम, रोली, सिंदूर लगाते हैं। इसके बाद लइया,गट्टा, खिलौना व अन्न का भोग लगाकर सात दीपक लगाएं।
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ऐसे पूजन से धन लक्ष्मी और सर्वसौभाग्य की प्राप्ति होगी। अगर संभव हो तो 21 हरे मोती शंख, 21 पीली कौड़ियां और 21 काली कौड़ियां पीले वस्त्र में बांधकर मां लक्ष्मी के मंत्र का जाप करें। इसके बाद इन्हें तिजोरी या जहां पर धन रखते हैं वहां पर रख दें।
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ऐसे करें धनवंतरि की पूजा
धनवंतरि का पूजन करने के लिए धनतेरस की पूजा वाले स्थान के दाएं ओर एक नया पाटा रखकर बीच में सतिया बनाएं। इसमें दाईं ओर ओम और बाईं ओर लक्ष्मी (श्री) बना लें। तीनों पर एक-एक सुपारी कलावा बांधकर रखें।
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बीच में धनवंतरि का पूजन करें। ओम वाले स्थान पर कुबेर का पूजन होगा और श्री वाले स्थान पर लक्ष्मी जी का। सबसे पहले धनवंतरि पर जल देकर हल्दी कुमकुम का टीका लगाएं। ओम धनवंतराय नमो नम: मंत्र 16 बार पढ़ें।
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रोली, चावल, पान, लौंग, इलायची, हर, बहेड़ा, आंवला, हल्दी व केसर चढ़ा दें। फल में सिंघाड़ा, कैथा, गन्ने के टुकड़े चढ़ाएं। इसके बाद प्रार्थना करें कि परिवार में कोई रोग और व्याधि न आए।
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गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति लेते समय ध्यान दें
गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति लेते समय विशेष ध्यान देना चाहिए। गणेश जी की सूंड़ दायीं ओर मुड़ी होनी चाहिए और एक दंत दिखना चाहिए। सवारी मूषक हो या सिंहासन पर विराजमान हों। वहीं, लक्ष्मी कमल पुष्प पर विराजमान हों, क्योंकि कमल लक्ष्मी जी का प्रधान आसन है।
उल्लू को लेकर भ्रांति है क्योंकि उल्लू रात्रिचर पक्षी है। उल्लू के साथ में लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों का वास हो जाता है। इसलिए गृहस्थ जीवन में कमल पर विराजमान लक्ष्मी जी की मूर्ति ही श्रेष्ठ है।