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खुलासा: ग्रामीण क्षेत्रों में अवसाद बढ़ा, रोगियों में 30 फीसदी इजाफा, कोविड का तंत्रिकाओं पर दुष्प्रभाव

Mon, 06 Feb 2023 10:33 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संक्रमण ने नर्वस सिस्टम पर दुष्प्रभाव छोड़ा है। इससे हैप्पी हारमोंस का रिसाव घट गया है और नकारात्मक हारमोंस बढ़ गए हैं। इसी वजह से दिक्कत हो रही है। स्वास्थ्य कार्यक्रम के सर्वे में यह स्थिति सामने आ रही है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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अमूमन कहा जाता है कि नगरीय क्षेत्रों में आपाधापी के कारण अवसाद, उलझन, बाई पोलर जैसे रोगों के रोगी अधिक हैं और गांवों में खुला माहौल होने की वजह से मनोरोगी कम हैं। हालांकि अब ऐसा नहीं है। कोरोना काल के बाद ग्रामीण इलाकों में अवसाद, एंजाइटी आदि के रोगी 30 प्रतिशत तक बढ़े हैं। नगर में 10 सीएचसी हैं। इनमें हर माह लगने वाले शिविर में कोरोना से पहले औसतन डेढ़ हजार मरीज आते थे। अब इनकी संख्या दो हजार पहुंच गई है।

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राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संक्रमण ने नर्वस सिस्टम पर दुष्प्रभाव छोड़ा है। इससे हैप्पी हारमोंस का रिसाव घट गया है और नकारात्मक हारमोंस बढ़ गए हैं। इसी वजह से दिक्कत हो रही है। स्वास्थ्य कार्यक्रम के सर्वे में यह स्थिति सामने आ रही है। रोगियों को चिह्नित करके उन्हें एक महीने की दवाएं दी जा रही हैं। साथ ही आशा कार्यकर्ता, एएनएम को इन रोगियों की निगरानी के लिए लगाया गया है। रोगियों का स्वास्थ्य परीक्षण हर महीने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर विशेषज्ञ करते हैं।

सर्वे के दौरान चिह्नित रोगियों की डायग्नोसिस तैयार की गई तो पता चला कि उन्हें कोरोना संक्रमण हुआ था, उसके बाद अब उन्हें मानसिक समस्या पैदा हो रही है। इसके अलावा कुछ रोगी ऐसे हैं, जिन्हें कोविड जैसे लक्षण उभरे थे लेकिन जांच नहीं कराई थी। इनमें युवाओं की संख्या अधिक है। इनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल हैं।

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राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के पूर्व जिला समन्वयक डॉ. एसके निगम ने बताया कि इन रोगियों की जांच मानसिक रोग विशेषज्ञ करते हैं। इसके साथ ही इनकी पैथोलॉजिकल जांचें भी कराई जाती हैं। डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर, लिवर, गुर्दे के पुराने रोगियों को कोरोना के बाद अधिक दिक्कत हो गई है। आशा कार्यकर्ता एएनएम की जिम्मेदारी होती है कि वे रोगियों की निगरानी करें और उन्हें जांच के लिए लाएं। जांच के बाद रोगियों को एक महीने की दवा दी जाती है।

केस-एक: चौबेपुर के रहने वाले ब्रज किशोर (20) को अचानक बहुत तेज गुस्सा आता है। कभी गुमसुम हो जाता है। सीएचसी में जांच कराई। इसके बाद रोगी ने हैलट में मनोरोग विभाग की ओपीडी जांच कराई। वह कोविड से संक्रमित हुआ था। इलाज होम आइसोलेशन में किया। कहता है कि अचानक गुस्सा आता है। काम, छोड़ दिया है। कभी बहुत तेज घबराहट होती है और नींद नहीं आती।

केस-दो: बिधनू की रचना (19) ने कल्याणपुर के मनोरोग शिविर में दिखाया। इसके बाद हैलट ओपीडी में भी जांच कराई। उसका मां फूलदेवी ने बताया कि उसे घबराहट होती है। जान देने की बात करती है। बहुत अधिक बात करती है, टोकने पर लड़ती है। पढ़ाई छोड़ दी है। खाना कम खाती है। डॉक्टर ने उसे अवसाद बताया है।

महीने में एक बार सीएचसी में लगता मनोरोग शिविर
- औसत दो सौ रोगी आते हैं शिविर में
- 65 फीसदी रोगी अवसाद के
- 15 फीसदी रोगी एंजाइटी के
- 10 फीसदी रोगी बाई पोलर के
- 10 फीसदी रोगी मेनिया के
- सबसे अधिक रोगी 18 से 50 वर्ष आयु वर्ग के

इन हारमोंस का रिसाव हुआ कम
- डोपामिन, सीरोटोनिन, आक्सीटोसिन, एंडोरफिन
- इन्हें हैप्पी हारमोंस कहा जाता है।
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ये बढ़े
कार्टिसोल, एडरीनलीन

मनोरोग विभाग की ओपीडी में भी बढ़े रोगी
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की ओपीडी में ग्रामीण इलाकों से आने वाले रोगियों की संख्या बढ़ गई है। इनमें युवाओं की संख्या अधिक है। रोगी अवसाद, अनिद्रा, उलझन, मेनिया, बाईपोलर आदि दिक्कतें लेकर आ रहे हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि 20 से 25 फीसदी रोगियों की संख्या बढ़ी है।

ऐसे करें बचाव
- खुद को मजबूत बनाएं
- समस्या का डटकर मुकाबला करें
- नकारात्मक बात करने वालों से दूर रहें
- सोशल मीडिया पर नकारात्मक चीजें न देखें
- परिवार में बैठकर सकारात्मक बातें करें
- घर के सदस्य एक-दूसरे की ताकत बनें
(संदीप कुमार सिंह, साइको काउंसलर, उर्सला)
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