कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मृदाविज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र सिंह यादव ने किसानों एडवाइजरी जारी की। बताया कि मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद सबसे सस्ता विकल्प है। किसान खेतों में हरी खाद का प्रयोग करके मिट्टी को कम लागत जैविक तरीके से अधिक उपजाऊ बना सकते हैं।
हरी खाद बनाने के लिए ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ज्वार और बरसीम मुख्य फसलें है। अप्रैल-मई महीने में गेहूं की कटाई के बाद खेत को सींचने के बाद 30 से 35 किलो ढैंचा का बीज प्रति हेक्टेयर की दर से फैला दें और जरूरत पड़ने पर 15 से 20 दिन में हल्की सिंचाई कर दें। इसके साथ ही 20 दिन पर 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया को खेत में फैला देते हैं, जिससे जड़ ग्रंथियां बनने में सहायता मिलती है। 40 से 45 दिन बाद हल चलाकर हरी खाद को खेत में मिला दिया जाता है इस तरह लगभग 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर की दर से हरी खाद उपलब्ध हो जाती है।
मृदा वैज्ञानिक डॉ. खलील खान ने बताया कि हरी खाद केवल नाइट्रोजन व कार्बनिक पदार्थों का ही साधन नहीं है, बल्कि इससे मिट्टी में कई पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी भुरभुरी, वायु संचार अच्छा, जल धारण क्षमता में वृद्धि, अम्लीयता/ छारीयता में सुधार एवं मृदा क्षरण भी कम होता है। हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है। इसके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम कर आर्थिक बचत और टिकाऊ खेती भी कर सकते हैं।