डीसीपी क्राइम सलमान ताज पाटिल ने बताया कि आरोपी कभी सीबीआई तो कभी सेना, एफसीआई आदि विभाग के अफसर बनकर लोगों से मिलते थे, इसके बाद उन्हें जाल में फंसाकर बाकायदा ट्रेनिंग कराते थे। इसमें ओएफसी में टर्नर प्रदीप सिंह की मुख्य भूमिका रहती थी।
वह ओएफसी के मैदान की बुकिंग करवाता था। उसके बाद उक्त कैंडीडेट की ट्रेनिंग करवाता था। हैलट का एक संविदा कर्मी मेडिकल करवाता था। करीब एक महीने बाद शिकार को नियुक्ति पत्र थमा देते थे। इस संविदा कर्मी को भी पुलिस ने आरोपी बनाया है।
हूबहू तैयार करते थे नियुक्ति पत्र
आरोपियों के पास अलग-अलग विभाग व अधिकारियों की कुल 38 मुहर मिली हैं। फर्जी नियुक्ति पत्र भी मिले हैं। डीसीपी ने बताया कि नियुक्ति पत्र संबंधित विभाग जैसे ही हैं। पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि गूगल की मदद से नियुक्ति पत्रों का प्रारूप देखा था। उसी आधार पर वह ये निुयक्ति पत्र तैयार करते थे।
इसलिए दूसरे राज्य के लोगों को कानपुर बुलाते थे
अधिकतर पीड़ित अन्य राज्यों से हैं। गिरोह के एजेंट वहां से लोगों को जाल में फंसाकर कानपुर भेजते थे। जिससे जब उनको नौकरी न मिले तो वह ज्यादा भागदौड़ न कर पाएं। इससे आरोपी बचते रहेंगे। मगर चकेरी वाले केस ने आरोपियों को बेनकाब कर दिया।
जमीन बेचकर दी थी रकम, अब मजदूरी करने पर मजबूर
डीसीपी ने बताया कि बिहार निवासी रत्नेश नाम का शख्स भी गिरोह का शिकार हुआ। उसने रेलवे में नौकरी के लिए कई बार में तीन चार लाख रुपये आरोपियों को दिए थे। रत्नेश से जब संपर्क किया गया तो पता चला कि उसने नौकरी के लिए जमीन तक बेच दी थी। अब वह मजदूरी करने पर मजबूर है। इसी तरह के तमाम बेबस व गरीब लोगों को आरोपियों ने शिकार बनाया है।