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Kanpur News: बिन मुलायम सपा- कुनबा बचाया, अब कारवां बचाने की चुनाैती

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इटावा। 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए (पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से सपा ने 37 सीटें जीत लीं। लेकिन 2026 में होने वाले ग्राम पंचायतों के चुनाव सपा के लिए असली अग्नि परीक्षा साबित होंगे। बिना मुलायम पार्टी के लिए यह पहला पंचायत चुनाव होगा। इसमें पार्टी के संगठन की भी परीक्षा होगी।
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सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव का 10 अक्तूबर 2022 को निधन हो गया था। इसके बाद समाजवादी पार्टी को संभालने और उनकी साख बनाए रखने की जिम्मेदारी अखिलेश यादव पर आ गई। 2016 के अंत से सपा परिवार में पड़ी खटास से तमाम सवाल उठने लगे थे। मुलायम सिंह के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में भी दिखी थी। तब भाजपा ने प्रदेश के कैबिनेट मंत्री जयवीर सिंह को उपचुनाव में उतारकर मुलायम की विरासत को झटकने का प्रयास किया था, लेकिन शिवपाल सिंह यादव ने खुद मोर्चा संभालकर अखिलेश की पत्नी व बहू डिंपल को बड़ी जीत दिलाई थी। इसके बाद उन्होंने कई बार मंच से अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान किया। दोनों चाचाओं के अनुभव और अखिलेश की राजनीतिक समझ ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें दिलाकर देश की तीसरी पार्टी बना दिया। वहीं गठबंधन में आई कांग्रेस भी सपा के पीडीए फॉर्मूले के साथ प्रदेश में छह सीटें जीत गई थी। राजनीतिक विद्वानों के अनुसार, बीते लोकसभा चुनाव में भले ही सपा ने झंडे गाड़े लेकिन पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव में मुलायम की कमी सपा को खल सकती है। बिना मुलायम पहला स्थानीय चुनाव 2026 में पंचायत का होगा। अब देखना है कि बिना मुलायम इसमें कैसे अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।



2021 के पंचायत चुनाव सपा की यह रही थी स्थिति

2021 के पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्यों की लगभग 3050 सीटों पर चुनाव हुए थे। इसमें लगभग 790 सपा समर्पित प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी, जबकि भाजपा समर्पित करीब 599 ही प्रत्याशी जीत सके थे। बसपा समर्पित 361 व निर्दलीय, अन्य दलों से समर्पित लगभग 1247 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी। उधर, जिला पंचायत अध्यक्ष के प्रत्याशियों में सपा का पलड़ा हल्का रहा था। सिर्फ पांच प्रत्याशियों ने ही जीत का सेहरा पहना था, जबकि भाजपा के लगभग 67 प्रत्याशी जीते थे।
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2022 विस चुनाव में 111 सीटों पर करना पड़ा था सपा को संतोष

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा की पारिवारिक कलह का असर चुनावों पर भी दिखा था। मुलायम सिंह यादव यादव की रणनीति के बावजूद सपा को सिर्फ 111 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था, जबकि भाजपा ने 255 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी। इस चुनाव में निष्क्रिय बसपा को सिर्फ एक ही सीट मिली थी।



मायावती की सक्रियता बढ़ाएगी चिंता



लोकसभा चुनाव में बसपा की निष्क्रियता का फायदा सपा को मिला था। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पीडीए फाॅर्मूले से दलित वोटों को सपा की ओर झुका दिया था। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के गठजोड़ ने सपा को बड़ी जीत दिलाई थी। यह देखते हुए अब बसपा विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से सक्रिय होती नजर आ रही है। कांशीराम की पुण्यतिथि पर गुरुवार को बसपा सुप्रीमो की ओर से की गई महारैली में आई भीड़ ने फिर दलित वोटों का झुकाव बसपा की ओर जाने का इशारा किया है। उधर, अपने भाषण में मायावती ने सपा को ही निशाने पर लिया।
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