बेहमई कांड 43 साल बाद आज भी लोगों के जेहन में गूंजता है। एक डकैत गिरोह को पनाह देने का आरोप लगाकर किस तरह फूलन देवी गैंग के डकैतों ने खुशहाल बेहमई गांव को देखते ही देखते कुछ पलों में उजाड़ दिया था इसकी बानगी घटना के बाद दर्ज कराई गई एफआईआर बताती है। सिकंदरा थानान्तर्गत बेहमई निवासी लाखन सिंह के पुत्र राजाराम ने जो तहरीर दी थी उसमें साफ लिखा था कि 14 फरवरी 1981 को सुबह पांच बजे राइफलों, बंदूकों व हथियारों से लैस रामऔतार, मुस्तकीम, फूलनदेवी, लल्लू समेत 35-36 डकैत गांव में घुस आए और लूटपाट करने लगे।
कई गांववालों की हत्या कर दी और कई को घायल कर दिया। गांव के विश्वनाथ सिंह, करन सिंह, जसवंत सिंह, जाहर सिंह, तखत सिंह आदि ने डकैतों को ललकारा तो डकैत धमकी देने लगे कि देखें तुम लोग श्रीराम, लालाराम गैंग को कब तक खाना देते हो। अगर खाना दिया तो इसी तरह पूरे गांव को मार डालेंगे। डकैतों द्वारा घर की छतों पर चिट्ठियां भी छोड़ी गई थीं जिन्हें कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया गया था।
विश्वनाथ उर्फ पोतानी की जगह विश्वनाथ उर्फ कृष्णस्वरूप को भेजा था जेल
बचाव के दौरान कोर्ट में दिए बयान में विश्वनाथ ने कहा था कि घटना के समय वह कक्षा 10 का छात्र था। उसके घर के बगल में विश्वनाथ उर्फ पोतानी उर्फ अशोक का घर है। पुलिस पोतानी को पकडऩे आई थी लेकिन विश्वनाथ के धोखे में पुलिस उसे स्कूल से पकड़कर ले गई थी और दो दिन थाने में रखने के बाद गवाहों से पहचनवा कर उसे जेल भेज दिया। पुलिस के दबाव में गवाहों ने झूठा बयान दिया। उसका असली नाम विश्वनाथ उर्फ कृष्ण स्वरूप है जबकि पुलिस विश्वनाथ उर्फ पोतानी के शक में उसे गिरफ्तार कर लाई थी।
दोषी के लिए अभियोजन ने मांगी थी फांसी
श्यामबाबू केवट की सजा पर सुनवाई के दौरान डीजीसी फौजदारी राजू पोरवाल ने फांसी की मांग की थी। कहा था कि श्यामबाबू ने फूलन देवी गिरोह के सक्रिय सदस्य के रूप में डकैती व नरसंहार को अंजाम दिया था। ऐसे वीभत्स कांड के दोषी को अधिकतम सजा मिलनी चाहिए। वहीं बचाव पक्ष ने परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र सहारा बताकर श्यामबाबू के लिए रहम की मांग की थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद दस्यु प्रभावित क्षेत्र कानपुर देहात के विशेष न्यायाधीश अमित मालवीय ने 77 पेज के अपने फैसले में श्यामबाबू को उम्रकैद की सजा सुनाई।
सिर्फ पांच पर ही तय हो सके थे आरोप
एडीजीसी डॉ. विजय सिंह ने बताया कि पुलिस ने सबसे पहले बालादीन, भीखा, रामरतन, ब्रजबिहारी, रामसिंह, पोसा उर्फ पोसे, फूलनदेवी, रामऔतार, मानसिंह, विश्वनाथ उर्फ पुतानी उर्फ कृष्ण स्वरूप, रामसिंह व श्यामबाबू केवट के खिलाफ आरोप पत्र कोर्ट में पेश किया था। बाद में अभियोजन की अर्जी पर जालौन निवासी पुस्सू यादव के बेटे मान सिंह को भी कोर्ट ने तलब कर लिया था। लेकिन मानसिंह कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ उसे फरार घोषित कर दिया गया। आरोप तय होने से पहले ही बालादीन, रामरतन, ब्रजबिहारी, फूलनदेवी व रामऔतार की मुकदमे की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। सिर्फ भीखा, पोसा उर्फ पोसे, विश्वनाथ, रामसिंह, श्यामबाबू उर्फ श्याम केवट के खिलाफ आरोप तय हुए। सुनवाई के दौरान भीखा, रामसिंह व पोसा की भी मौत हो गई थी।
तीन चश्मदीद समेत सात ग्रामीणों ने दी थी गवाही
एडीजीसी प्रशांत मिश्रा ने बताया कि घटना की एफआईआर दर्ज कराने वाले राजाराम सिंह के अलावा घटना के चश्मदीद वकील सिंह, जंटर सिंह व ग्रामीण करन सिंह, विश्वनाथ सिंह, मरजाद सिंह, तखत सिंह ने कोर्ट में गवाही दी थी। साथ ही सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक छोटेलाल गुप्ता, जेबी तिवारी व सत्यप्रकाश सिंह समेत अभियोजन ने कुल 15 गवाह कोर्ट में पेश किए थे।
गवाही देने से पहले ही हो गई थी अभियोजन के दस गवाहों की मौत
विशेष लोक अभियोजक विकास सिंह ने बताया कि सामूहिक नरसंहार में राजेंद्र सिंह, जगन्नाथ सिंह, सुरेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, शिवराम सिंह, नजमा उर्फ जनमुल हसन, रामऔतार, देव सिंह, हुकुम सिंह, शिवबालक, तुलसीराम, बनवारी सिंह, नरेश सिंह आदि की हो गई थी मौत, रघुवीर सिंह, वकील सिंह, देवप्रयाग, कृष्ण स्वरूप, जंटर सिंह, गुरमुख सिंह हुए थे घायल। मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन के गवाह जाहर सिंह, जसवंत सिंह, रघुवीर सिंह, प्रभु सिंह, समृद्ध सिंह, सोबरन सिंह, श्रीमती रामकुंवर, कृष्ण स्वरूप, गुरमुख सिंह व तकदीर सिंह की मौत हो चुकी थी।
दोषमुक्त किए गए विश्वनाथ को कोर्ट ने पहले ही किशोर घोषित कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी जो लंबित है। मुकदमे में विश्वनाथ को किशोर होने का भी लाभ मिला। निर्णय का परीक्षण करने के बाद जरूरत पड़ने पर विश्वनाथ के बरी होने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। फरार चल रहे मानसिंह, रामरतन व विश्वनाथ के खिलाफ कोर्ट ने स्थाई वारंट जारी कर रखा है।
राजू पोरवाल, डीजीसी फौजदारी
गवाहों ने विश्वनाथ की शिनाख्त नहीं की थी। उसके पास से कोई बरामदगी भी नहीं हुई थी। गलत गिरफ्तारी कर उसको जेल भेजा गया था। कोर्ट के सामने सारे तथ्यों को रखा गया और निर्दोष को इंसाफ मिला। कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के बाद श्यामबाबू को किन आधारों पर सजा सुनाई गई है उसका परीक्षण किया जाएगा। श्यामबाबू की रिहाई के लिए भी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी।- गिरीश नारायण दुबे, विश्वनाथ के अधिवक्ता