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UP: रेवड़ी की तरह परिवारों को बांटी करोड़ों की शजर किट, ODOP योजना में उद्योग विभाग का फर्जीवाड़ा, पढ़ें मामला

Thu, 29 May 2025 06:54 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांदा

सार

Banda ODOP Scheme Case: मामले में अधिकारियों का कहना है कि योजना में प्रशिक्षण का दायित्व प्रदेश सरकार गैर सरकारी संगठनों को अपने स्तर से सौंपती है। इसमें विभाग का कोई दखल नहीं है। उन्होंने स्वीकारा कि सही तरीके से प्रशिक्षण नहीं हो रहा। इस कारण शजर कारीगर तैयार नहीं हो पा रहे हैं।
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जिला उद्योग केंद्र, बांदा - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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बांदा जिले मे शजर पत्थर का कारीगर और कारोबारी बनाने में उद्योग विभाग के अफसरों ने जमकर खेल किया है। विभाग ने एक ही परिवार के कई लोगों को कुछ दिन की ट्रेनिंग देकर कारीगर बना दिया। इसमें पति-पत्नी और पुत्र-पुत्री भी शामिल हैं। इतना ही नहीं जिनकी शजर में दिलचस्पी नहीं थी।

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उन्हें भी ट्रेनिंग देकर दो-दो हजार रुपये और करीब 20 हजार रुपये की किट पकड़ा दी। जिले की केन नदी में पाए जाने वाले शजर पत्थर को ओडीओपी (एक जिला , एक उत्पाद ) योजना में शामिल किया है। सरकार शजर को देश और विदेश में पहचान दिलाने के साथ ही बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराना चाहती है।

रेवड़ी की तरह बांट दी 20 हजार की किट
हालांकि, सरकार की मंशा पर उद्योग विभाग के अफसर पानी फेर रहे हैं। करीब 1800 पुरुषों और महिलाओं को शजर पत्थर की कटिंग और तराशने की ट्रेनिंग की रस्म अदाकर उन्हें दो-दो हजार रुपये पकड़ा दिए। लाभार्थियों को लगभग 20 हजार रुपये की किट रेवड़ी की तरह बांट दी।

लाभार्थियों के घरों में कबाड़ की तरह पड़ी है किट
इसमें तीन करोड़ 60 लाख रुपये ठिकाने लगा दिए, लेकिन शजर का कोई नया कारोबार नहीं खुला। किट लाभार्थियों के घरों में कबाड़ की तरह पड़ी है। इसके अलावा मंडल मुख्यालय में नियुक्त मंडलीय अफसर ज्यादातर कार्यालय नहीं आते। गैर जिले का संबद्ध किया गया इकलौता लिपिक मंडलीय कार्यालय चला रहा है।

केस-1
शहर के द्वारिका प्रसाद सोनी के लगभग पूरे परिवार को योजना का लाभार्थी बना दिया। इनमें सौरभ सोनी, नेहा सोनी, प्रीति सोनी, रविशंकर सोनी आदि शामिल हैं। हालांकि द्वारिका सोनी शजर पत्थर के कारीगर और व्यवसायी हैं। उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

केस-2
शहर के आजाद नगर निवासी मो. बरकत बेग, उनकी पत्नी और पुत्री रुखसार को योजना में लाभार्थी बनाकर किट दी गई है। इसके अलावा उन्हें दो-दो हजार रुपये अनुदान भी दिया गया है। फूटा कुआं (बांदा) निवासी एक ही परिवार के आनंद खरे और राधा खरे भी लाभार्थियों की सूची में शामिल हैं।

केस-3
महोखर की रमादेवी ने बताया कि पत्थर काटने वाली मशीन मिली है। वही का हम घर मा धर दीन है। चार-चार बच्चन का भला यह से खर्च कहां चल पाई? फार्म भरने में 300 रुपये लग गए। 10 दिन तक रोजाना किराया-भाड़ा लगाकर गांव से आना पड़ा।

केस-4
कांशीराम कॉलोनी की रेखा गुप्ता का कहना है कि हम सिलाई मशीन चाहते थे, पर यह कहकर मना कर दिया गया कि फार्म खत्म हो गए हैं। उसके बजाय पत्थर काटने की मशीन और औजार दे दिए हैं। अब क्या बताएं कि इसे चला पाएंगे या नहीं?
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योजना में प्रशिक्षण का दायित्व प्रदेश सरकार गैर सरकारी संगठनों को अपने स्तर से सौंपती है। इसमें हमारा कोई दखल नहीं है। उन्होंने स्वीकारा कि सही तरीके से प्रशिक्षण नहीं हो रहा। इस कारण शजर कारीगर तैयार नहीं हो पा रहे हैं।  -गुरुदेव,उपायुक्त, उद्योग, बांदा
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