बिसंडा के ओरन रोड पर बुधवार शाम को काल बनकर आए एक बेकाबू और तेज रफ्तार ट्राला ने सवारियों से भरे ई-रिक्शा को इस कदर रौंदा कि एक ही झटके में छह लोगों की हंसती-खेलती दुनिया उजड़ गई। यह महज एक आम सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि बेकाबू रफ्तार, ओवरलोडिंग और जनता की जायज मांगों को रद्दी की टोकरी में फेंकने वाले सिस्टम की घोर लापरवाही का नतीजा है। हादसे के बाद सड़क पर बिछी लाशों और चारों तरफ बिखरे खून के धब्बों ने जो खौफनाक मंजर बयां किया, उसने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया है।
त्योहार की खुशियां मातम में बदलीं, फीकी हुई बकरीद
इस दर्दनाक हादसे का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि ई-रिक्शा में सवार सभी लोग अपने घरों में त्योहार की खुशियां मनाने की तैयारी में जुटे थे। अगले ही दिन बकरीद का पावन त्योहार था, जिसे लेकर बिसंडा थाना क्षेत्र के कोर्रही गांव के दो मुस्लिम परिवारों के घरों में भारी उत्साह था। घर की महिलाएं और बच्चे नए कपड़े, राशन और बच्चों के लिए खिलौने खरीदने की हसरत लिए ई-रिक्शा पर सवार होकर बिसंडा कस्बे के मुख्य बाजार जा रहे थे। किसे पता था कि बाजार पहुंचने से पहले ही मौत रास्ते में घात लगाए बैठी है। इस हादसे ने कोर्रही गांव की ईद की खुशियों को हमेशा-हमेशा के लिए मातम के काले साये में धकेल दिया और पूरे गांव का चूल्हा तक नहीं जला।
छह साल बाद सऊदी से लौटा था मुबीन, एक पल में उजड़ गया सुहाग
हादसे का शिकार हुए कोर्रही गांव निवासी मुबीन (40 वर्ष) की कहानी किसी का भी कलेजा कपा दे। मुबीन अपने परिवार के बेहतर भविष्य और बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए कड़ाके की धूप में सऊदी अरब में रहकर खून-पसीना बहाता था। करीब 6 साल के लंबे इंतजार के बाद वह महज दो महीने पहले ही अपने वतन और अपने गांव लौटा था।
मौत के तांडव के बीच मां की ममता की जीत
इस खौफनाक चीख-पुकार और मौत के तांडव के बीच 'मां की ममता' की एक ऐसी मिसाल देखने को मिली जिसने डॉक्टरों से लेकर पुलिसकर्मियों तक की आंखें नम कर दीं। जब बेकाबू ट्राला ई-रिक्शा को कुचल रहा था और लोहे के भारी पुर्जे इंसानी जिस्म को चीर रहे थे, उस खौफनाक मोड़ पर शबाना ने अपनी जान की परवाह नहीं की।
लाशों के ढेर पर जागा प्रशासन
हादसे में कोर्रही गांव के मुबीन (40), शहबाज (10), ममता (48) और ई-रिक्शा चालक राकेश (50) की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई थी। जबकि गंभीर रूप से घायल सोहनलाल (50 वर्ष), उनकी पत्नी बौरी (50) और बेटी शिवकली (17) को बिसंडा पीएचसी से जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान सोहनलाल ने भी दम तोड़ दिया।
क्या छह मौतों के बाद ही बंद होंगे ओवरलोड ट्रक?
स्थानीय निवासियों का गुस्सा पूरी तरह से जायज है। ग्रामीणों का आरोप है कि बिसंडा कस्बे के बेहद संकरे रास्तों के बीच से रोजाना बालू से लदे ओवरलोड ट्रक और भारी ट्राला काल बनकर दौड़ते हैं। कई बार स्थानीय संगठनों और ग्रामीणों ने तहसील और जिला प्रशासन को लिखित ज्ञापन सौंपकर नो-इंट्री लागू करने की गुहार लगाई थी, लेकिन कुंभकर्णी नींद में सोए सिस्टम ने तब तक कोई एक्शन नहीं लिया जब तक कि छह लाशें सड़क पर नहीं बिछ गईं।