भारत दर्शन अगरबत्ती वर्क्स के मैनेजर मुस्तफा कहते हैं कि 2014 से पहले कन्नौज की अगरबत्ती की देश भर में मांग थी। एक किलो माल पर सात रुपये तक का मुनाफा मिल जाता था। वियतनाम और चीन का माल आने के बाद एक रुपये किलो मुनाफा निकालना मुश्किल हो रहा है। कारोबार बंद होने की स्थिति में था। केंद्र सरकार के इस फैसले से बड़ी राहत मिली है।
कभी 3000 मजदूर थे, अब बचे सिर्फ 50
1980 से चल रही श्री जय अंबे अगरबत्ती कंपनी के मालिक रामजी लाल ने बताया कि किसी समय उनकी कंपनी में 3000 मजदूर तक काम करते थे। हर किसी को सात आठ हजार रुपये तक आमदनी हो जाती थी। जब से दूसरे देश का माल आना शुरू हुआ, बाजार में उनके माल की मांग घट गई। अब यह 50 ही रह गए हैं। कारोबार 20 फीसदी ही बचा है।
काम न मिलने से मजदूरी को मजबूर हैं कारीगर
अगरबत्ती का काम करने वाले हाफीजीन का कहना है कि वियतनाम और चीन से आ रहे माल ने लोकल के काम को खत्म सा कर दिया था। अकेले कन्नौज में अगरबत्ती बनाने की करीब 400 मशीनें लगी हैं। इनमें से आधी बंद हो गई थीं। नए फैसले से फिर से यह कारोबार रफ्तार पकड़ेगा। कारीगर मजदूरी करने को मजबूर थे। इन्हें अब फिर से काम मिल सकेगा।
केंद्र सरकार का यह कदम सराहनीय है। कन्नौज में यह लघु उद्योग की तरह चल रहा था। वियतनाम और चीन से कड़ी टक्कर मिलने से यह 70 फीसदी तक सिमट गया। इसे फिर से ताकत मिलेगी। कारोबार पहले की स्थिति में लौटने से न सिर्फ राजस्व बल्कि रोजगार भी बढ़ेगा। एक अनुमान के मुताबिक कन्नौज में 50 कारखानों में अगरबत्ती बन रही हैं।
- शक्ति विनय शुक्ला, डायरेक्टर, सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) कन्नौज।