दुनिया कहती है कि किस्मत हाथो की लकीरों में होती है, लेकिन जिनके हाथ नही होते किस्मत तो उनकी भी होती है। यह कहावत 13 साल के मासूम अबु हमजा पर सटीक बैठती है। जिसकी हिम्मत के सामने किस्मत भी छोटी और बौनी मालूम पड़ती है।
हम बात कर रहे है इटावा निवासी कक्षा 7 में पड़ने वाले अबु हमजा की जो दोनों हाथों से दिव्यांग होने के बावजूद भी आम बच्चो की तरह साइकिल से स्कूल जाता है। स्कूल के कंप्यूटर लैब में कंप्यूटर चलाता है। पैरों से पेन पकड़कर कॉपी पर जब लिखना शुरू करता है तो अच्छे अच्छे उसकी लेखनी देखकर शरमा जाते है।
पांच साल की उम्र में करंट लग जाने से अपने दोनों हाथ गंवा चुके अबु के पिता ने हिम्मत नहीं हारी और अस्पताल से छुट्टी के बाद अपने लख्ते जिगर को फिर से कक्षा 2 में (हादसे के वक़्त) स्कूल लेकर पहुंच गए स्कूल वाले परेशान थे कि बच्चे को कैसे पढ़ाया जाए क्योंकि पढ़ाई के साथ लिखना भी जरूरी होता है।