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पांच साल की उम्र में अबु ने एक हादसे में खो दिए थे दोनों हाथ, जीने का जज्बा देख आप भी करेंगे सलाम

Mon, 20 Jan 2020 02:21 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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अबु हमजा - फोटो : अमर उजाला
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दुनिया कहती है कि किस्मत हाथो की लकीरों में होती है, लेकिन जिनके हाथ नही होते किस्मत तो उनकी भी होती है। यह कहावत 13 साल के मासूम अबु हमजा पर सटीक बैठती है। जिसकी हिम्मत के सामने किस्मत भी छोटी और बौनी मालूम पड़ती है। 
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हम बात कर रहे है इटावा निवासी कक्षा 7 में पड़ने वाले अबु हमजा की जो दोनों हाथों से दिव्यांग होने के बावजूद भी आम बच्चो की तरह साइकिल से स्कूल जाता है। स्कूल के कंप्यूटर लैब में कंप्यूटर चलाता है। पैरों से पेन पकड़कर कॉपी पर जब लिखना शुरू करता है तो अच्छे अच्छे उसकी लेखनी देखकर शरमा जाते है। 

पांच साल की उम्र में करंट लग जाने से अपने दोनों हाथ गंवा चुके अबु के पिता ने हिम्मत नहीं हारी और अस्पताल से छुट्टी के बाद अपने लख्ते जिगर को फिर से कक्षा 2 में (हादसे के वक़्त) स्कूल लेकर पहुंच गए स्कूल वाले परेशान थे कि बच्चे को कैसे पढ़ाया जाए क्योंकि पढ़ाई के साथ लिखना भी जरूरी होता है।
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साइकिल चलाता अबु हमजा और साथ में माता पिता - फोटो : अमर उजाला
तब अबु ने पैरों से पेन थाम कर लिखना शुरू किया और केवल 2 माह में ही पैरो से लिखने में माहिर हो गया। आज अबु कक्षा 7 में पढ़ रहा है और उसका सपना कंप्यूटर इंजीनियर बनने का है। अबु के इस जज्बे और हिम्मत के पीछे जितना उसके मां बाप, भाई का सहयोग है उतना ही हाथ अबु के स्कूल के दोस्त ऋषभ का है।

अबु का दोस्त ऋषभ जो स्कूल में सिर्फ एक दोस्त ही नही एक मां का किरदार भी अदा कर रहा है क्योंकि जिस तरह अबु की मां अपने बच्चे को घर पर खाना खिलाती है वही काम ऋषभ स्कूल में करता है और इंटरवल में अपने हाथों से अबु को खाना खिलाता है और जब अबु को टॉयलेट आती है तो ऋषभ ही उसको टॉयलेट लेकर जाता है।

छुट्टी में अबु का स्कूल बैग लेकर अबु की साइकिल तक आता है। अबु का एक बड़ा भाई है जिसने अबु के लिए एक साइकिल खास डिजाइन की है जिससे अब अबु स्कूल आता जाता है। अबु की एक छोटी बहन है और अबु के पिता ट्रांसपोर्टर हैँ।
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