उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग में नौकरी दिलाने के नाम पर 43 अभ्यर्थियों से करीब 80 लाख रुपये की ठगी की गई। आरोपियों ने खुद को आयोग के संयुक्त सचिव का रिश्तेदार और निजी सहायक बताकर अभ्यर्थियों को एलडीसी लिपिक व चतुर्थ श्रेणी पदों पर नियुक्ति का झांसा दिया। मामले में कोतवाली पुलिस ने तीन आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी की प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के मुताबिक, फिलहाल एक ही अभिभावक सामने आए हैं, जिनके बेटे और बेटी से रुपये लेने का आरोप है।
नेहरू नगर निवासी प्रॉपर्टी केयरटेकर शरद अवस्थी ने प्राथमिकी में बताया कि उनकी मुलाकात फजलगंज निवासी नीरज मिश्रा से हुई थी। नीरज ने अपने ममिया ससुर अरविंद नारायण शुक्ला को शिक्षा आयोग, प्रयागराज में संयुक्त सचिव बताया और दावा किया कि उन्होंने उसकी चतुर्थ श्रेणी पद पर नियुक्ति कराई है। नीरज ने बताया था कि वह बेनी सिंह इंटर कॉलेज, भीतरगांव में तैनात है। उसने राज्यपाल कोटे से तृतीय श्रेणी के एलडीसी लिपिक और चतुर्थ श्रेणी पदों पर सीधी भर्ती कराने का भरोसा दिया।
शरद के अनुसार, उनके बेटे यशवर्धन और बेटी अर्चिता की एलडीसी पद पर नियुक्ति के लिए नीरज ने पांच-पांच लाख रुपये मांगे। नियुक्ति पत्र मिलने से पहले ढाई लाख और नौकरी लगने के बाद शेष ढाई लाख रुपये देने की बात तय हुई। शरद ने जुलाई से सितंबर 2025 के बीच दोनों बच्चों के लिए अलग-अलग किस्तों में ढाई-ढाई लाख रुपये दिए। एक साल बीतने के बाद भी नियुक्ति नहीं हुई। उनके मित्र शान अली से भी भतीजे मोहम्मद सोहेल की नियुक्ति के नाम पर जून 2025 में दो लाख रुपये लेने का आरोप है।
लखनऊ और प्रयागराज बुलाकर कराए हस्ताक्षर
शिकायत के मुताबिक, अभ्यर्थियों को लखनऊ स्थित शिक्षा निदेशालय और प्रयागराज स्थित आयोग में बुलाकर लिपिक पद के आवेदन पत्रों पर हस्ताक्षर कराए गए। उन्हें बताया गया कि पांच सितंबर 2025 को लोकभवन में मुख्यमंत्री की ओर से नियुक्ति पत्र बांटे जाएंगे, लेकिन तारीख लगातार टलती रही। शिकायत में 16 मई 2026 के एक पत्र का भी उल्लेख है, जिसमें प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की अनुपस्थिति के कारण नियुक्ति पत्र वितरण की तारीख आगे बढ़ने की बात कही गई थी। नई तारीख की सूचना समाचार पत्रों से देने का आश्वासन मिला था।
प्राथमिकी में नीरज मिश्रा के अलावा अरविंद नारायण शुक्ला और बाबू ज्ञानेंद्र दुबे को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि ज्ञानेंद्र दुबे खुद को संयुक्त सचिव का निजी सहायक बताता था। इंस्पेक्टर अरुण कुमार ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। एसीपी अमित कुमार पांडे के मुताबिक, अरविंद शुक्ला नाम का कोई व्यक्ति आयोग में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत नहीं पाया गया।