जींस-जैकेट में सजे नौजवान बता सकते हैं कि फैशन का ट्रेंड क्या है। अंगूरी और कामिनी ने शादी नहीं की, अपने पैरों पर खड़े होने की तैयारी कर रही हैं। गांव में इंटर और डिग्री कालेज न होने पर दुखी हैं। रीतेश की पढ़ने की ललक उन्हें कन्नौज आवासीय विद्यालय ले गई। वह आईएएस बनना चाहते हैं और इसकी तैयारी कैसे की जाती है, बखूबी मालूम है।
गांव के सतीचरन, गंभीर, रामजी और गोविंद पुलिस में हैं। कोई नई तकनीक से खेती कर रहा, किसी ने आसपास दुकान खोल ली तो कोई मुंबई और दिल्ली में नौकरी कर रहा। वे घर पैसे भेजते हैं, जिससे घर-परिवार की दशा बदल रही है। गुढ़ापुरवा में ही लगभग यही दृश्य है। फूलन की शादी 12 साल की उम्र में कर दी गई थी और उसकी बर्बादी देख गांव सतर्क हो गया।
अब कोई 18 साल से पहले लड़कियों की शादी नहीं करता। हर लड़की स्कूल जाती है। पूर्व प्रधान की नातिन सोनी आठवीं में है। उसे पता है कि शिक्षक बनने के लिए उसे क्या करना है। मंजू ने आईटीआई के बाद शादी की। गांव कुरीतियों पर चोट करता और नए जमाने से तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहा है।
सरकारी योजनाओं का भी पर्याप्त लाभ लिया जा रहा। मनरेगा ने भी बड़े पैमाने पर रोजगार दिया। गांव में अब चिट्ठी नहीं, व्हाट्सएप मैसेज आता है। टीवी कई घरों में है। स्मार्टफोन के शोरूम और रिचार्ज की सुविधा गांव के आसपास उपलब्ध है। मैगी, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स की दुकान भी है।
अब गांव बदल रहा है। पढ़ाई पर ध्यान है। गांव के कई लड़के बाहर से अच्छा कमाकर घर भेज रहे हैं। इस कारण रहनसहन और तौरतरीका बदला है। शादियों में हैसियत के मुताबिक सजावट और जश्न होता है। ऊंची और नीची जाति का सोच भी किसी हद तक बदला है। जागरुकता आ गई है।
देवेंद्र प्रताप सिंह, बेहमई
अब प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। कपड़ों और घर की सजावट पर भी खर्च किया जा रहा है। कमाई के साधन बढ़ाने पर गांव वालों का जोर है। उनकी समझ में आ गया है कि फालतू बैठने से अच्छा है कि कुछ ऐसा करें जिससे गरीबी रेखा से ऊपर उठ सकें। अभी भी गांव में गरीबी है पर 40 साल में आर्थिक हालात बदले हैं। जागरुकता ने सरकारी योजनाओं का लाभ लेना सिखा दिया है।
सिद्धनाथ, गुढ़ापुरवा