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40 साल पहले बेहमई में खून से लाल हुई थी धरती अब बदल रही यमुनापट्टी के आसपास गांवों की तस्वीर

Tue, 16 Feb 2021 12:17 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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यमुनापट्टी के आसपास बदल रही तस्वीर - फोटो : amar ujala
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हाथ में स्मार्ट फोन, बदन पर जींस-जैकेट, बाइक की सवारी, खेत के लिए ट्रैक्टर, पक्के मकान, पक्का लिंक रोड और मिजाज में मस्ती। वक्त के साथ सोच बदला तो लड़कियों ने भी गांवों की दहलीज लांघकर स्कूल-कॉलेज का रुख किया। अब बिजली की रोशनी में गांव चमकते हैं। बुजुर्ग महिलाएं भले ही घूंघट की ओट से बात करती हों, लेकिन नई पीढ़ी की लड़कियां मुखर हैं।
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वे अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हैं। कई नौकरी कर रही हैं। अब बाल विवाह नहीं होते। लड़की की पसंद को भी तवज्जो दी जाती है। पेश है शैलेश अवस्थी की रिपोर्ट। यह दृश्य है 40 साल से चर्चित कानपुर देहात के बेहमई और कालपी के गुढ़ापुरवा गांव का। अब यहां फूलन, डाकू और बीहड़ के इतर भी बहुत कुछ है, जिस पर चर्चा होती है। युवा पीढ़ी भविष्य और गांव के विकास की चिंता करती है।

राजपुर से 12 किलोमीटर बेहमई और यहां से 10 किलोमीटर दूर गुढ़ापुरवा गांव की तस्वीर खासी बदल गई है। तब बीहड़ पट्टी के इन गांवों तक पहुंचने के लिए कच्चे, पथरीले रास्तों पर घंटों पैदल चलना पड़ता था। अब पक्की सड़कें, बसें, आटो, टेंपो भी हैं। हर तीसरे घर में बाइक है। कार, ट्रैक्टर और बड़ी गाड़ियां भी दिखती हैं। बेहमई में स्मार्ट फोन पर खबरें देख रहे गुड्डू गांव वालों को बाखबर रखते हैं।
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जींस-जैकेट में सजे नौजवान बता सकते हैं कि फैशन का ट्रेंड क्या है। अंगूरी और कामिनी ने शादी नहीं की, अपने पैरों पर खड़े होने की तैयारी कर रही हैं। गांव में इंटर और डिग्री कालेज न होने पर दुखी हैं। रीतेश की पढ़ने की ललक उन्हें कन्नौज आवासीय विद्यालय ले गई। वह आईएएस बनना चाहते हैं और इसकी तैयारी कैसे की जाती है, बखूबी मालूम है।

गांव के सतीचरन, गंभीर, रामजी और गोविंद पुलिस में हैं। कोई नई तकनीक से खेती कर रहा, किसी ने आसपास दुकान खोल ली तो कोई मुंबई और दिल्ली में नौकरी कर रहा। वे घर पैसे भेजते हैं, जिससे घर-परिवार की दशा बदल रही है। गुढ़ापुरवा में ही लगभग यही दृश्य है। फूलन की शादी 12 साल की उम्र में कर दी गई थी और उसकी बर्बादी देख गांव सतर्क हो गया।

अब कोई 18 साल से पहले लड़कियों की शादी नहीं करता। हर लड़की स्कूल जाती है। पूर्व प्रधान की नातिन सोनी आठवीं में है। उसे पता है कि शिक्षक बनने के लिए उसे क्या करना है। मंजू ने आईटीआई के बाद शादी की। गांव कुरीतियों पर चोट करता और नए जमाने से तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहा है।

 
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सरकारी योजनाओं का भी पर्याप्त लाभ लिया जा रहा। मनरेगा ने भी बड़े पैमाने पर रोजगार दिया। गांव में अब चिट्ठी नहीं, व्हाट्सएप मैसेज आता है। टीवी कई घरों में है। स्मार्टफोन के शोरूम और रिचार्ज की सुविधा गांव के आसपास उपलब्ध है। मैगी, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स की दुकान भी है।

अब गांव बदल रहा है। पढ़ाई पर ध्यान है। गांव के कई लड़के बाहर से अच्छा कमाकर घर भेज रहे हैं। इस कारण रहनसहन और तौरतरीका बदला है। शादियों में हैसियत के मुताबिक सजावट और जश्न होता है। ऊंची और नीची जाति का सोच भी किसी हद तक बदला है। जागरुकता आ गई है।
देवेंद्र प्रताप सिंह, बेहमई

अब प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। कपड़ों और घर की सजावट पर भी खर्च किया जा रहा है। कमाई के साधन बढ़ाने पर गांव वालों का जोर है। उनकी समझ में आ गया है कि फालतू बैठने से अच्छा है कि कुछ ऐसा करें जिससे गरीबी रेखा से ऊपर उठ सकें। अभी भी गांव में गरीबी है पर 40 साल में आर्थिक हालात बदले हैं। जागरुकता ने सरकारी योजनाओं का लाभ लेना सिखा दिया है। 
सिद्धनाथ, गुढ़ापुरवा

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