रोज कमाने-खाने वाले तांगा चालकों ने सोमवार को
हिम्मत जुटाई और घोड़ा-तांगा लेकर कोतवाली के पास सड़क किनारे खड़े हुए। यह
देखकर पैदल आने-जाने वाले लोग तांगे में बैठ गए। इसके बाद उन्हें सरायमीरा
पहुंचाने व सरायमीरा से शहर पहुंचाने का सिलसिला शुरू हो गया।
तांगा
चालक शकील ने बताया तीन दिन से घर में बैठे-बैठे ऊब गए। राशन-सब्जी खत्म हो
गई तो पेट भरने की समस्या उत्पन्न हो गई। सोमवार को सड़क पर लोगों को
आता-जाता देखा तो मन में हिम्मत जगी और वह तांगा लेकर रोजीरोटी कमाने निकल
पड़े। उसने कहा कि नफरत की बजाय इंसानियत की बातें करनी चाहिए।
उसके तांगे
में बैठने वाली सवारियां हर जाति धर्म की होती हैं। जिन्हें वह उनके बताए
स्थान तक छोड़ता है। सफर करने वाले चाहें हिंदू हों या मुसलमान, उन्हें
तांगे में बैठाकर मंजिल तक पहुंचाने के बाद बदले में जो किराया मिलता है,
उससे उसका व बीवी-बच्चों का पेट भरता है।
दोपहर बाद देखा-देखी कई अन्य
तांगा चालक भी रोड पर आए तो सवारियों का आवागमन शुरू हो गया। इससे तांगा
चालकों को जहां रोजी-रोटी कमाने का अवसर मिला वहीं महिलाओं, पुरुषों व
बच्चों को तीन से चार किमी पैदल चलने की समस्या से राहत मिल गई। ज्ञात हो
कि कन्नौज के शहरी क्षेत्र में जाने के लिए जीटी रोड से दो रास्ते निकले
हैं।
एक सरायमीरा से ग्वालमैदान होकर और दूसरा मकरंदनगर से हरदेवगंज होते
हुए शहर तक जाता है। सरायमीरा से ग्वालमैदान वाले रूट पर केवल तांगा चालक
ही सवारियां ढोते हैं। टेंपो को इससे जाने की परमिट नहीं है। इस निर्धारित
रूट पर तांगा चलाने वाले करीब आधा सैकड़ा परिवार जीविकोपार्जन करते हैं।