कन्नौज। खाड़ी देशों में युद्ध से सदियों पुराना इत्र उद्योग व्यापारिक संकट से जूझ रहा है। युद्ध के कारण इत्र निर्यात में भारी गिरावट आई है। इससे स्थानीय व्यापारियों और मजदूरों में चिंता बढ़ गई है। कन्नौज में 400 इत्र कारखाने हैं। इनका 55 से 60 फीसदी प्राकृतिक अतर और इत्र खाड़ी देशों को निर्यात होता है। युद्ध के कारण समुद्री मार्गों पर जोखिम और परिवहन संबंधी समस्याएं बढ़ी हैं। इससे खाड़ी देशों से मिलने वाले आदेश निरस्त या स्थगित हो गए हैं। इत्र कारोबार में 65 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है।
मार्च का महीना रमजान और ईद के कारण इत्र कारोबारियों के लिए सबसे सफल माना जाता है। सामान्य वर्षों में इस दौरान करोड़ों रुपये का मुनाफा होता था। इस साल तनावपूर्ण वैश्विक स्थितियों ने मांग आधी कर दी है। ओमान और लाल सागर क्षेत्र में बढ़ते जोखिम के कारण माल ढुलाई और बीमा लागत कई गुना बढ़ गई है। बैंकिंग लेनदेन और अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों में आ रही बाधाओं ने छोटे निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ाई हैं।
मजदूरों पर संकट
इत्र कारखानों में दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों पर संकट गहरा गया है। उन्हें प्रतिदिन 500 रुपये मेहनताना दिया जाता है। कारखानों में 65 फीसदी काम बंद होने से करीब 800 मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। काम न मिलने से वे घर पर बैठे हैं और उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मजदूरों का कहना है कि हालात न सुधरे तो उन्हें दूसरे शहरों की ओर पलायन करना पड़ेगा।
यूरोपीय व अफ्रीकी बाजारों की ओर रुख करने की योजना
अतर एंड परफ्यूमर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पवन त्रिवेदी व इत्र कारोबारी आशीष पांडेय का कहना है कि वह अब अपनी निर्भरता खाड़ी देशों से कम करने और यूरोपीय व अफ्रीकी बाजारों की ओर रुख करने की योजना बना रहे हैं। हाल ही में भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुए व्यापारिक समझौतों से कुछ उम्मीदें जगी हैं, लेकिन मौजूदा युद्ध की स्थिति तत्काल राहत मिलने में बड़ी बाधा बनी हुई है।