छिबरामऊ (कन्नौज)। वह दौर गुलामी का था और देश की आजादी का इंतजार हर हिंदुस्तानी की आंखों में था। फिर आया 15 अगस्त 1947 का वह ऐतिहासिक दिन, जब सदियों की गुलामी की बेड़ियां टूटीं और देश ने आजाद भारत में पहली सांस ली। उस समय की यादें अब धुंधली जरूर हो चली हैं लेकिन छिबरामऊ क्षेत्र के उन बुजुर्गों की आंखों में आज भी आजादी की पहली सुबह की खुशी साफ दिखाई देती है, जिन्होंने उस ऐतिहासिक पल को अपनी आंखों से देखा और महसूस किया था। किसी ने रेडियो पर आजादी की खबर सुनी तो किसी को स्कूल पहुंचने पर मास्टर साहब ने बताया कि देश आजाद हो गया है। किसी ने गांव की गलियों में खुशी का शोर सुना तो किसी ने पहली बार तिरंगे को शान से लहराते देखा।
आजादी की 80वीं वर्षगांठ पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाने की तैयारी में सभी जुटे है। तिरंगे की छांव में जब पूरा राष्ट्र जश्न-ए-आजादी की तैयारी कर रहा है। अमर उजाला ने उन बुजुर्गों से बात की जो 15 अगस्त 1947 के उस ऐतिहासिक सवेरे के साक्षी रहे हैं। उम्र की सदी की दहलीज पर खड़े इन बुजुर्गों से जब उस दौर की बात छिड़ी। तो झुर्रियों से भरे उनके चेहरे पर वही 80 साल पुरानी चमक और उत्साह तैर गया।
क्षेत्र के देववरमपुर ढकुरैया निवासी 95 वर्षीय गिरीशचंद्र द्विवेदी उस दिन को याद करते हुए रोमांचित हो उठते हैं। उन्होंने बताया कि उस वक्त गांव में संचार का एकमात्र सहारा रेडियो था। जैसे ही रेडियो पर देश के स्वतंत्र होने की घोषणा हुई,तो पूरा गांव खुशी से उछल पड़ा। लोग गलियों में निकल आए, एक-दूसरे को गले लगाया और पूरे गांव में जमकर मिठाइयां बांटी गईं।
महमूदपुर खास निवासी 99 वर्षीय रामशरण पांडेय उम्र के इस पड़ाव पर शारीरिक रूप से शिथिल जरूर हैं, लेकिन वह दिन उनकी स्मृति में आज भी तरोताजा है। वह बताते हैं, उस समय वह स्कूल में पढ़ते थे। रोज की तरह जब बस्ता लेकर स्कूल पहुंचे, तो वहां अलग ही माहौल था। शिक्षकों ने बताया कि गोरों की गुलामी खत्म हो गई है और देश आजाद हो चुका है। यह सुनते ही सभी सहपाठियों ने मिलकर तिरंगा फहराया और पूरे गांव में जश्न मनाया।
मोहल्ला बिरतिया निवासी 96 वर्षीय चंदावती बताती हैं कि उस ऐतिहासिक सुबह वह घर के दैनिक कामकाज में व्यस्त थीं। तभी गांव की गलियों में देश आजाद हो गया का शोर सुनाई दिया। पता चला कि अंग्रेजी हुकूमत खत्म हो गई है और भारत स्वतंत्र हो गया है। उस दिन गांव की चौपाल से लेकर हर घर में खुशियां मनाई गईं और प्रसाद स्वरूप मिठाइयां बांटी गईं।
मोहल्ला इंदिरानगर निवासी एवं दूरसंचार विभाग से सेवानिवृत्त 96 वर्षीय रामप्रकाश मिश्रा कहते हैं कि उस समय वह काफी छोटे थे, लेकिन बुजुर्गों के चेहरों पर गुलामी की बेड़ियों से मुक्ति का सुकून साफ देखा जा सकता था। वर्षों के संघर्ष और बलिदान के बाद उस सुबह हर भारतीय ने स्वाभिमान और खुली हवा में सांस ली थी। वह दिन देश के इतिहास का सबसे बड़ा उत्सव था।