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आलू की खुदाई से चौपट हुई पढ़ाई

Sat, 14 Feb 2015 11:39 PM IST
अमर उजाला कन्नाैैज
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जिले में एक पखवारे से शुरू हुई आलू की खुदाई ने परिषदीय प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों की पढ़ाई व्यवस्था चौपट कर दी है। महज 150 रुपये और पांच किलो आलू के लिए स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहाल खेतों में आलू बिनाई और खुदाई का काम कर रहे हैं। इसके चलते स्कूलों में महज 20 से 30 फीसदी बच्चे ही पहुंच रहे हैं।
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जिले में आलू की सर्वाधिक पैदावार होती है। पक्की फसल की खुदाई शुरू होते ही परिषदीय प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों की छात्र संख्या में तेजी के साथ गिरावट शुरू हो जाती है। स्कूल न आने में बड़ी तादात लड़कियों की रहती हैं। खेतों में आलू की खुदाई करने के एवज में उनको प्रतिदिन 150 रुपये मजदूरी व पांच किलो आलू मिलता है।

इस कारण वह आलू की खुदाई के सीजन में स्कूल जाना छोड़ देते हैं। टीचर स्कूल में छात्र संख्या बनाए रखने के लिए अभिभावकों से संपर्क करते हैं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलता है। अमर उजाला टीम शनिवार को जब खुसटिया के प्राथमिक विद्यालय पहुंची तो वहां पर सहायक अध्यापक प्रतिष्ठा दुबे ने बताया कि प्रधानाध्यापक अवकाश पर हैं।
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विद्यालय में 71 छात्र पंजीकृत हैं, जबकि दस छात्र उपस्थित हैं। अभिभावकों से छात्रों को स्कूल भेजने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन अभिभावक आलू की खुदाई के चलते स्कूल नहीं भेजते हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालय अहमदपुर रौनी में 230 छात्र पंजीकृत हैं। जबकि 40 छात्र उपस्थित हुए। हेड टीचर रवी कुमार ने बताया कि आलू की खुदाई के चलते छात्र संख्या गिर रही है।

अभिभावकों में जागरूकता की कमी
खेतों में आलू खोद रही कक्षा आठ की छात्रा अंकिता ने कहा कि आलू खोदने के लिए उसके पिता ने भेजा है। कहा कि कुछ दिनों की बात है, उसके बाद स्कूल चली जाना। प्राइमरी विद्यालय खुसटिया में पढ़ने वाले ऋषभ, विष्णू ने बताया कि इन दिनों आलू खोद लेने से काफी रुपया बच जाता है। इससे अभिभावकों से रुपये मांगने की जरूरत नहीं पड़ती।
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टीचर भी बराबर के जिम्मेदार
प्राथमिक विद्यालय अहमदपुर रौनी के सहायक अध्यापक आशुतोष का कहना है कि आलू की खुदाई के दौरान छात्रों की संख्या काफी कम हो जाती है यह सच है, लेकिन इसके लिए टीचर कहीं न कहीं से जिम्मेदार है। जब तक विद्यालयों में शैक्षणिक वातावरण तैयार नहीं होगा, और टीचर बच्चों को मन लगाकर नहीं पढ़ाएगा, तब तक स्थित नहीं सुधर सकती। बच्चों के मनपसंद अध्यापक होने पर छात्र स्वयं ही स्कूल की ओर खिंचा चला आता हैं, लेकिन इसमें अभिभावकों को भी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी।
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वजीफा बंद होने से गिरी संख्या
अमहपुर रौनी गांव के रहने वाले उमेर अली का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग पहले ही शिक्षा के प्रति अधिक जागरूक नहीं है। सरकार पहले कक्षा एक से आठ तक के छात्रों को वजीफा प्रदान करती थी। वजीफा मिलने की लालच में ही तमाम अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेज देते, इस बार वह भी बंद कर दिया गया। बड़ा परिवार होने के नाते अभिभावकों की मजबूरी है कि वह बच्चों से आलू खुदाई का कार्य कराते हैं।
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विभिन्न योजनाओं में टीचरों की ड्यूटी
परिषदीय विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था और भी बदतर होने के आसार दिखाई दे रहे हैं। करीब एक हजार से अधिक टीचरों को बोर्ड ड्यूटी में लगाया जा रहा है। इसके अलावा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत टीचरों की ड्यूटी लगाई गई है। इन दोनों महत्वपूर्ण कार्यों के चलते स्कूल में और भी शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होगी।
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पिछले कई दिनों से विद्यालयों में आकस्मिक छापेमारी चल रही है। इस दौरान छात्रों की संख्या काफी कम मिल रही है। इसका प्रमुख कारण आलू की खुदाई बताया जा रहा है। सभी एबीएसए को निर्देश जारी किए जा रहे हैं कि वह सभी एबीआरसी को लगाकर टीचरों व शिक्षा मित्रों को निर्देशित करें कि वह स्कूल अवधि के पहले अथवा बाद में प्रधान के माध्यम से अभिाभवकों से मिलें और उनको बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करें।
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रामकरन यादव, बीएसए
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