विधान सभा चुनाव के बाद जिले के आलू किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। जिले में 105 शीतगृहों में से करीब 85 फीसदी फुल हो गए हैं। इनमें 40 में ताले लटक रहे हैं। अन्य शीतगृहों में करीब 15 से 20 फीसदी जगह बची है। इन शीतगृहों के मालिकों ने अपने आलू किसानों को बारदाना दे रखा है। वह सिर्फ उन्हीं का आलू अपने शीतगृहों में रखेंगे। ऐसे में अभी 35 फीसदी से ज्यादा फसल खेतों में ही है। ऐसे में वर्ष 1998 का इतिहास दोहरा सकता है। इस वर्ष शीतगृह फुल होने से किसानों को आलू फेेंकना पड़ा था।
इस बार 48 हजार 500 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की फसल हुई है। किसान करीब 15 फीसदी कच्ची फसल क ी बिक्री कर लेते हैं। इस बार नोट बंदी से मंदी रही। इससे किसानों ने कच्ची फसल बेचने में दिलचस्पी नहीं ली। पक्की फसल को भी सही दाम नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में किसान आलू को शीतगृह में भंडारित कर रहे हैं।
इस समय चुनाव आचार संहिता लागू है। ऐसे में प्रदेश सरकार से भी राहत की उम्मीद नहीं है। खोदाई के बाद शीतगृह के बिना आलू को ज्यादा दिन तक सुरक्षित रख पाना किसानों के लिए मुश्किल होगा। इस हाल में किसानों को आलू का एक्सपोर्ट ही राहत दे सकता है। ऐसा नहीं हुआ तो किसानों को आलू फेंकना पड़ेगा।
प्रगतिशील किसान योगेंद्र सिंह का कहना है कि पैदावार के हिसाब से करीब बीस फीसदी आलू शीतगृह के बाहर रहने के आसार हैं। प्रगतिशील किसान गीतेंद्र यादव कहते हैं कि आलू का समर्थन मूल्य तय किए बिना हालात सुधरने वाले नहीं हैं। वहीं जिला उद्यान अधिकारी मुन्ना यादव ने बताया कि जिले में 40 शीतगृह फुल हो चुके हैं। अन्य शीतगृहों ने भी करीब 80 फीसदीं से ज्यादा आलू भंडारण कर लिया है। इन पर निगाह रखी जा रही है। फिलहाल आचार संहिता के चलते किसी तरह की योजना लागू नहीं कराई जा सकती।