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बिजली मिले तो चलें ट्यूबवेल

Sat, 27 Feb 2016 11:42 PM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
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सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, पर यह सच है कि जिले में 5,625 बीघा खेत बिजली न मिलने के कारण प्यासे हैं। सरकार ने कई करोड़ रुपये खर्च करके नलकूप तो बना दिए, लेकिन विद्युतीकरण का कार्य पूर्ण न हो पाने के कारण वे शोपीस बने हैं। इस वजह से मुख्यमंत्री की सर्वोच्च प्राथमिकता वाले जिले में मुफ्त सिंचाई योजना के लाभ से करीब एक दर्जन गांवों के एक हजार से अधिक किसान वंचित हैं।
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ज्ञात हो कि वित्तीय वर्ष 14-15 में तालग्राम विकास खंड क्षेत्र के गांव धौरारा निस्तौली में 28टीजी, हसेरन विकास खंड क्षेत्र के गांव नंदेनगला में 32टीजी, छिबरामऊ विकास खंड क्षेत्र के गांव भूटा बनवारी में 201 सीएचजी, उमर्दा ब्लाक क्षेत्र के गांव भुन्ना में 36 सीएचजी, छिबरामऊ ब्लाक के धिंगपुर में 25 सीएचजी नाम से नए नलकूप का निर्माण कराया गया था।

एक नलकूप की क्षमता एक क्यूसिक पानी निकालने की है। इससे 625 बीघा कृषि क्षेत्रफल की सिंचाई होनी है। करीब छह महीने से भी ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन ये नलकूप किसानों के लिए बेमतलब साबित हो रहे हैं। बनने के बाद से इनमें से अब तक एक भी बूंद पानी नहीं निकल सका है।
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इसी तरह वित्तीय वर्ष 13-14 में छिबरामऊ ब्लाक क्षेत्र के गांव लौह टिकुरिया में 189 सीएचजी व पंथरा में 133 सीएचजी नलकूप का निर्माण कराया। इनकी क्षमता डेढ़ क्यूसिक यानी 1250 बीघा कृषि क्षेत्रफल की सिंचाई करने की है, लेकिन करीब एक साल बीत जाने के बाद भी ये किसी काम के नहीं हैं।

विभागीय सूत्रों की मानें तो इन नलकूपों का संचालन तभी शुरू हो सकता है, जब बिजली आपूर्ति मिले। बताया जाता है कि नलकूप निर्माण खंड और विद्युत विभाग के अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी के कारण नलकूपों को बिजली मिलने में विलंब हो रहा है। इसका खामियाजा किसानों को सिंचाई सुविधा से वंचित होकर चुकाना पड़ रहा है।

खेतों की सिंचाई न होने पाने से परेशान किसान कभी बिजली विभाग तो कभी नलकूप खंड के चक्कर लगा रहे हैं। दोनों विभाग एक-दूसरे पर टालमटोल कर रहे हैं। वहीं जनप्रतिनिधि भी इस मामले में चुप्पी साधे हैं। उधर, किसानों की माने तो यदि नलकूपों से पानी मिले तो वे साल भर में तीन फसलें खेतों में तैयार कर सकते हैं।

कहा कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति भी संवरेगी। किसानों ने बताया कि मौजूदा समय में बरसात के मौसम में ही एक फसल हो पाती है। वहीं कुछ लोग डीजल चालित इंजनों के सहारे खेती करते हैं लेकिन उससे लागत कई गुना बढ़ जाती है।
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