हंसलोक जनकल्याण समिति के तत्वावधान में आयोजित
सत्संग में विचारक वीरेंद्र सिंह ने कहा कि मानव यदि परमात्मा की भक्ति का
जिज्ञासु है तो उसे सद्गुरु की शरण में जाकर विनम्र भाव से शंकर भजन को
जानना होगा, तभी वह भक्त कहलाने का अधिकारी बन सकेगा।
राधेश्याम ने कहा
कि मनुष्य पर चार कृपाएं होती हैं। पहली कृपा ईश्वर की होती है, जो मानव
चोला देता है। दूसरी कृपा वेद शास्त्रों की, तीसरी कृपा गुरु महाराज की और
चौथी कृपा अपने ऊपर स्वयं मनुष्य की होती है कि वह शंकर भजन जान कर प्रभु
नाम का सुमिरन करे।
मिथलेश सिंह ने मानस की पंक्तियां राम भक्ति मणि उस बस
जाके, दुख लवलेश न सपनेउ ताके की व्याख्या की। इसके अलावा रामजीत सक्सेना,
महिपाल सिंह, रूपलाल, बाबा जिलेदार सिंह, रामसनेही लाल शर्मा ने भी विचार
रखे। प्रधानाध्यापक सतीश द्विवेदी ने भजन सुनाकर वाहवाही लूटी। उन्होंने
बताया कि 14 जनवरी को सत्संग के बाद सामूहिक खिचड़ी भोज होगा।