पहले मौसम की, अब मंदी की मार से आलू किसानों की कमर टूट गई है। निगम मंडी में 200 रुपये क्विंटल आलू बिक रहा है। इससे किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही हैं। कुछ किसान भाव में तेजी आने की उम्मीद से कोल्ड स्टोरेज में आलू भर रहे हैं।
निगम मंडी में इन दिनों 700-800 मीट्रिक टन आलू प्रतिदिन आ रहा है। आसपास क्षेत्र से किसान ट्रैक्टर ट्रालियों में आलू लादकर मंडी पहुंच रहे हैं। पिछले दस दिनों से आलू के भाव में कोई उछाल नहीं आ रहा है। ऐसे में मक्का की बुवाई की तैयारी कर रहा किसान औने-पौने भाव में बेचने को तैयार है।
एक तरफ जहां आलू 200 रुपये क्विंटल बिक रहा है, वहीं मक्के का बीज पांच सौ रुपये किलो मिल रहा है। व्यापारी साबिर खां, पप्पू राईन, प्रहलाद नारायण का कहना है कि इस बार आलू के भाव में कोई खास उछाल नहीं आया। इससे जहां किसानों को घाटा हो रहा है, वहीं व्यापारियों को भी कोई खास फायदा नहीं हो रहा है। मुकेश तातिया, अजय कुमार, विनोद कुमार का कहना है कि आलू की मंदी की मार से किसान बेहाल हो गया है।
ग्राम नथा नगला निवासी श्यामू यादव ने बताया कि आलू के उत्पादन में प्रति बीघा लागत लगभग छह हजार रुपये आती है, जबकि इतने का आलू नहीं बिक रहा है। ऐसे में आलू की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है।
ग्राम मोहन नगला निवासी सर्वेश यादव ने बताया कि चुनाव के समय सभी राजनैतिक दल किसानों के लिए घोषणा पत्र बनाते हैं, लेकिन किसी ने आलू की बात नहीं की। सरकार को आलू का भी न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना चाहिए।
ग्राम नगला जयलाल निवासी विनोद कुमार ने बताया कि आलू की बेल्ट होने के बाद भी यहां किसानों को कोई राहत नहीं दी जा रही है। जिनके पास रकबा कम है वह आलू को औने-पौने दाम में बेचने को तैयार है। इसका मुख्य कारण किसानों के पास पूंजी नहीं है।
ग्राम खरौली निवासी सतेंद्र सिंह ने बताया कि जिस तरह संसद और विधानसभा में गन्ना किसानों का मुद्दा उठता है, उसी तरह आलू किसानों का भी मुद्दा उठना चाहिए। जिले में आलू की पैदावार अच्छी है। इसलिए यहां पर कोई आलू आधारित उद्योग भी लगाना चाहिए।