कन्नौज/तिर्वा। मेडिकल कालेज से निकलने वाले बॉयो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के नाम पर शासन को हर माह चूना लगाया जा रहा है। मेडिकल कालेज में बॉयो मेडिकल वेस्ट प्लांट होते हुए भी निजी संस्था को अनुबंध के तहत बॉयो कचरा निस्तारण का ठेका दे रखा गया है और इसके एवज में मोटा भुगतान किया जा रहा है।
400 बेड के राजकीय मेडिकल कालेज से प्रतिदिन करीब दो क्विंटल बॉयो मेडिकल वेस्ट निकलता है। इसमें एचआईवी, हेपेटाइटिस, कैंसर और टीबी व संक्रामक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के साथ ही सामान्य मरीजों के ऑपरेशन व इलाज के दौरान खून से सनी रूई, गाज-पट्टी, आईवी सेट, ड्रिप सेट, ग्लूकोज की बोतल, ग्लब्स, पैथोलॉजी में खून व पेशाब की जांच करने वाले वॉयल, इंजेक्शन, सुई शामिल हैं। इन्हें डिस्पोज करने के लिए मेडिकल कालेज में बॉयो मेडिकल वेस्ट प्लांट (इंसीनेरेटर) का 2009 में निर्माण कराया गया था। सिर्फ एक साल चिकित्सीय अपशिष्ट निस्तारित होने के बाद प्लांट बंद हो गया। इससे 2010 से कानपुर की एक निजी संस्था से अपशिष्ट निस्तारण का अनुबंध चल रहा है।
करीब 400 बेड वाले मेडिकल कालेज के बॉयो मेडिकल वेस्ट को निस्तारित करने के लिए संस्था को करीब 1.20 लाख प्रति माह यानि 14.40 लाख रुपये सालाना का भुगतान किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि बॉयो मेडिकल वेस्ट प्लांट होने के बाद भी आखिर निजी संस्था को बॉयो कचरा के निस्तारण का ठेका क्यों दे रखा गया है। जानकार बताते हैं कि शासन को कमीशन के लालच में लाखों का चूना लगाया जा रहा है। सीएमएस डॉ. दिलीप सिंह ने बताया कि बॉयो मेडिकल वेस्ट प्लांट खराब पड़ा हुआ है। इसे ठीक कराने के लिए जल्द प्रस्ताव भेजा जाएगा। इसके चालू होने के बाद ठेका व्यवस्था खत्म कर दी जाएगी।
कन्नौज। सूत्रों के मुताबिक जिम्मेदारों ने बॉयो मेडिकल वेस्ट प्लांट की चिमनी को खराब होने का हवाला दिया है। इससे निजी संस्था से कचरा निस्तारित कराया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि चिमनी को ठीक कराने के लिए करीब 50 हजार का खर्च आता है। चिमनी ठीक होने के बाद शासन को प्रतिमाह लाखों रुपये के खर्च से बचाया जा सकता है। लेकिन मेडिकल कालेज प्रशासन ऐसा नहीं कर रहा है।
सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को बॉयो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए 2003 में निजी कंपनियों को जिम्मेदारी दी गई थी। निजी कंपनियों द्वारा कूड़ा-कचड़ा उठाने का प्रमाण पत्र जारी करने के बाद अस्पतालों के संचालन की मंजूरी मिलती है। शासन की ओर से कुछ मेडिकल कालेज में प्लांट भी लगवाए, लेकिन जिम्मेदारों की मनमर्जी के मुताबिक कमीशन के लालच में निजी संस्था द्वारा ही कूड़ा उठवाया जा रहा है।