कन्नौज। कन्नौज-मैनपुरी सीमा पर स्थिति छिबरामऊ ब्लॉक के प्रेमपुरा गांव को फूलों से पहचान दिलाने वाले प्रगतिशील किसान विजेंद्र सिंह तोमर वर्ष में 12 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं। उनसे सीख लेकर आसपास के कई किसान भी फूलों की खेती से अच्छा मुनाफा कमाने लगे हैं।
विजेंद्र भी पहले परंपरागत खेती करते थे लेकिन उसने नुकसान होता रहता था। इस पर उन्होंने कृषि विभाग अधिकारियों और कुछ अन्य लोगों से चर्चा की। सभी ने ग्लोडियस की सलाह दी। वर्ष 2002 में विजेंद्र महाराष्ट्र के पुणे से ग्लोडियस की पौध जड़ लाए और पांच बीघा में खेती शुरू की। खेती की जानकारी की कमी के कारण पहली साल कम मुनाफा हुआ लेकिन ये कम आय भी परंपरागत खेती से ज्यादा थी। इसके बाद विजेंद्र सिंह फूलों की खेती का रकबा बढ़ाते गए। उनके पास 40 बीघा खेती है, इसमें 30 बीघे में ग्लोडियस के अलावा गुलदाडी, गेंदा की खेती कर रहे हैं। इसमें वर्ष में 10 से 12 लाख रुपये की कमाई करते हैं। प्रगतिशीत किसान विजेंद्र को जिला प्रशासन कई बार पुरस्कृत भी कर चुका है। उनको देखकर प्रेमपुर के अलावा माधोपुर, मलिकापुर, तेराजाकेट गांवों के कई किसान भी फूलों की खेती कर अच्छा लाभ ले रहे हैं।
दिसंबर व जनवरी में तैयार होती फसल
विजेंद्र सिंह ने बताया कि सितंबर से ग्लोडियस और अन्य फूलों की पौध लगाई जाती है। ये दिसंबर व जनवरी में तैयार हो जाती है। ग्लोडियस की पत्ती चार से पांच रुपये, गुलदाहड़ी की पत्त्ती भी चार से पांच रुपये व गेंदा करीब 100 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से जाता है। विजेंद्र के फूल दिल्ली, गाजीपुर, लखनऊ समेत अन्य शहरों में जाते हैं।
कोरोना ने ला दी दिक्कत:
विजेंद्र सिंह ने बताया कि आलू की तरह ग्लेडियस को भी शीतगृह में रखा जाता है। सितंबर में लगाने के समय निकालते हैं। यदि शीतगृह से नहीं निकाला तो बीज अंकुरित हो जाएगा। ऐेसे में दुबारा उन्हें नए बीज बाहर से मंगाने पड़ेंगे जो महंगा होगा। कोरोना महामारी के समय हो सकता है कि केवल बीज को बचाने के लिए खेती करें।
ग्लेडियोलस की पहले साल खेती करने पर लागत ज्यादा लगती है, क्योंकि बीज की कीमत ज्यादा होती है। बीज मिलाकर करीब 45 हजार रुपये प्रति बीघे का खर्च आ जाता है। अगले साल बीज की लागत छोड़कर करीब 65 हजार रुपये प्रति बीघा शुद्ध मुनाफा होता है। किसानों को परंपरागत खेती को छोड़कर फूल व बागवानी पर भी ध्यान देना चाहिए। -मनोज चतुर्वेदी, जिला उद्यान अधिकारी।