छिबरामऊ। सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इन सभी में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को सबसे कठिन माना गया है। व्रत के बारे में जानकारी देते हुए शक्ति पीठ गमा देवी मंदिर के पुजारी पंडित बनारसी दास शास्त्री ने बताया कि गुरुवार को श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और नियम के साथ यह व्रत रखेंगे। इस व्रत में जल की एक बूंद भी ग्रहण न करने का विधान है।
उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी के दिन सूर्याेदय से लेकर अगले दिन के सूर्याेदय तक पूरे 24 घंटे निर्जल व्रत का पालन किया जाता है। उन्होंने बताया कि जो श्रद्धालु पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते हैं। वे यदि सच्चे मन से केवल निर्जला एकादशी का व्रत रख लें, तो उन्हें वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है।
उन्होंने बताया कि जो लोग किन्हीं कारणों से या स्वास्थ्य की वजह से पूरे 24 घंटे निर्जल रहने में असमर्थ हैं। वे सूर्याेदय से लेकर सूर्यास्त तक भी निर्जल व्रत का पालन कर सकते हैं। ऐसा करने से भी उन्हें व्रत का आंशिक लाभ और भगवान विष्णु की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। इस दिन दान का बहुत महत्व होता है। विशेष कर घट दान, पादुका, छाता, पंखा, वस्त्रादि का दान करना बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।