छिबरामऊ। समाज को अपराधियों से भयमुक्त रखने का दावा करने वाली छिबरामऊ पुलिस 17 साल बाद भी साथियों के हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी है। यहां तक कि पुलिस कर्मियों से लूटी गईं राइफलें भी बरामद नहीं हुई हैं।
साल 2003 में छिबरामऊ कोतवाली की कस्बा चौकी पर हेड कांस्टेबल गोरेलाल व कांस्टेबल संतोष कुमार तैनात थे। 20 नवंबर 2003 की सुबह दोनों के शव बहबलपुर रोड से कमालपुर की तरफ जाने वाले मोड़ की पुलिया पर निर्वस्त्र हालत में मिले थे।
कुछ दूर पर ही पुलिस कर्मियों की बाइक पड़ी थी जबकि उनकी राइफल व 40 कारतूस हत्यारे लूट ले गए थे। तत्कालीन एसएसआई रुद्र सिंह ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। इसकी जांच तत्कालीन कोतवाल जितेंद्र परिहार को दी गई लेकिन पुलिस किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंची।
तत्कालीन पुलिस कप्तान ने 17 फरवरी 2005 को इस हत्या व लूटकांड की जांच सौरिख के तेज तर्रार थानाध्यक्ष एबरन सिंह को सौंपी। सौरिख के बाद यह जांच गुरसहायगंज कोतवाल को दी गई।
छिबरामऊ कोतवाली में एक के बाद एक आठ कोतवाल बदले और सभी ने जांच आगे बढ़ाई लेकिन ठोस परिणाम नहीं निकल सका। आखिरकार 25 जुलाई 2007 को पुलिस ने इसमेें फाइनल रिपोर्ट लगा दी।
2014 में आईजी दे चुके जांच के आदेश : 16 जुलाई 2014 को प्रोजेक्ट आइना की बैठक करने के लिए कोतवाली पहुंचे तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक आशुतोष पांडेय के सामने जब सिपाहियों की हत्या व उनसे लूटी गई राइफलों का मुद्दा उठाया गया तो उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक एके जैन से पूरे प्रकरण की जानकारी मांगी और जांच के आदेश दिए।
आठ कोतवाल भी न लगा सके हत्यारों का सुराग : 19-20 नवंबर 2003 की रात को हुई दो पुलिस कर्मियों की हत्या व उनसे राइफलें लूटने की जांच छिबरामऊ से सौरिख, गुरसहायगंज होते हुए वापस छिबरामऊ आई। चार साल में यहां आठ कोतवाल बदले और उन्होंने जांच को आगे बढ़ाया लेकिन कोई भी कोतवाल हत्यारों का सुराग नहीं लगा सका।
लोगों की जुबां पर आ जाता है पुलिस हत्याकांड : कानपुर नगर के चौबेपुर थाना क्षेत्र के बिकरू गांव में हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे व उसके साथियों द्वारा अंजाम दिए गए आठ पुलिस कर्मियों की हत्याकांड ने क्षेत्र के लोगों को बहबलपुर में पुलिस कर्मियों की हत्या व लूट की घटना याद दिला दी। लोगों का कहना है कि कानून के शिकंजे में न आने से ही इन अपराधियों दुस्साहस बढ़ता है।