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मैनपावर की कमी से स्वास्थ्य महकमा बीमार

Thu, 08 Jan 2015 12:25 AM IST
अमर उजाला, ब्यूरो, कन्नौज
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वीआईपी जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रदेश सरकार ने तरह-तरह की सुविधाएं मुहैया करा रखी हैं। भवन निर्माण के साथ अत्याधुनिक मशीनों के लिए लाखों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। लेकिन इसका एक फीसदी भी लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। वजह स्वास्थ्य विभाग के पास जरूरत के अनुरूप मैनपावर नहीं है। इसके चलते शासन से लेकर प्रशासन तक के दावों का दम निकाल दिया है।
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कन्नौज के कसबा छिबरामऊ, गुरसहायगंज, तिर्वा, जलालाबाद, ठठिया, गुगरापुर, हसेरन, सौरिख, इंदरगढ़, तालग्राम में बने सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता है। यदि पूरे जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं का सूरतेहाल अकेले जिला अस्पताल में जाने से ही पता चल जाता है।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिला अस्पताल को पूरी क्षमता से चलाने के लिए कुल 190 लोगों का स्टाफ होना चाहिए। इसकी तुलना में मात्र 47 लोगों की फौज ही मोर्चे पर डटी है। यही वजह है कि उपचार से लेकर दवाएं वितरण तक सारी व्यवस्थाएं पटरी से उतरी चल रही हैं।
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रिक्त पड़े 144 पद खुद ही अव्यवस्था की कहानी को बयां कर रहे हैं। मरीजों का कहना है कि महिला अस्पताल तो संचालित है, लेकिन सिर्फ एक डाक्टर के कंधे पर ही सारी व्यवस्था है। इस कारण 24 घंटे उपचार की सुविधा मिलने का दावा खोखला साबित हो रहा है।

मजबूरी में जिला अस्पताल में वही महिला मरीज उपचार कराने के लिए रुकती हैं जिनके पास पैसा नहीं होता है। तमाम मरीज तो जिला अस्पताल जाते हैं, लेकिन डाक्टर को न पाकर वापस लौट जाते हैं।

डाक्टरों के रिक्त पदों का ब्यौरा
मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका का एक पद, वरिष्ठ चिकित्साधिकारी के दोनों पद, वरिष्ठ फिजीशियन का एक पद, फिजीशियन का एक पद, रेडियोलाजिस्ट का एक पद, कार्डियोलाजिस्ट का एक पद, गाइनोकोलाजिस्ट का एक पद, आब्सट्रीशियन के दो पद, ईएमओ महिला के तीनों पद, चिकित्साधिकारी महिला के तीन में से दो पद खाली पड़े हैं।

इन डाक्टरों के न होने के कारण विभिन्न मर्जों की दवा ही मरीजों को नहीं मिल पाती है। जो मरीज पहुंचते हैं उन्हें या तो अंदाज से दवा दी जाती है या फिर दूसरे अस्पतालों में जाकर इलाज कराने की सलाह मिलती है।

पैरामेडिकल स्टाफ की कमी का हाल
फार्मासिस्ट का एक, लैब टैक्नीशियन का एक, सहायक मैटर्न का एक पद खाली पड़ा है। महिला मरीजों की देखभाल के लिए सिस्टर के कुल 18 पद सृजित हैं। इनमें से 16 पद रिक्त पड़े हैं, जिससे सारी व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। महिला मरीजों को देखभाल के लिए अपने परिजनों पर निर्भर रहना पड़ता है।

स्टाफ नर्स के 37 पद सृजित हैं, लेकिन इनमें से 34 पद रिक्त पड़े हैं। इससे नर्स के जरिए मरीजों को मिलने वाली राहत न के बराबर मिल रही है। फिजियोथेरेपिस्ट का एकमात्र पद खाली पड़ा है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के 77 पद जिला अस्पताल में हैं, जिनमें से 75 पद रिक्त पड़े हैं।

बेहतर तरीके से चला रहे जिला अस्पताल
जिला अस्पताल के सीएमएस डा. पीएम यादव का कहना है कि स्टाफ की भारी कमी होने के बावजूद वे अस्पताल को बेहतर तरीके से चला रहे हैं। जो सीजर करने की प्रक्रिया वर्षों से बंद थी, उसे शुरू कराया गया है। अब प्रसव पीड़ित महिलाओं के सीजर भी हो रहे हैं। एक मात्र महिला डाक्टर अपना काम बखूबी कर रही है। उन्होंने कहा कि जो मैन पावर उपलब्ध है, उससे जितना संभव है उतना इलाज का लाभ जनता को दिला रहे हैं।

लगातार चल रही लिखा-पढ़ी
मुख्य चिकित्साधिकारी डा. पीएन वाजपेयी का कहना है कि जिला अस्पताल समेत पूरे जिले में डाक्टरों से लेकर पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। सारी समस्या से शासन को अवगत कराया जा चुका है।

स्वास्थ्य मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक के सामने स्थिति पहुंच चुकी है। जल्द ही स्टाफ की उपलब्धता बढ़ाने का आश्वासन मिला है। कई चिकित्सक व अन्य स्टाफ ने अपनी तैनाती भी कराई है। धीरे-धीरे मैनपावर की कमी दूर होने से स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होने लगेंगी।

जनप्रतिनिधि बोले- कामचोरी कर रहे स्वास्थ्य कर्मी
इंदरगढ, विशुनगढ़ और मिघौली में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डाक्टरों व कर्मचारियों के गायब रहने से भड़के जिला पंचायत सदस्यों ने स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को जमकर खरीखोटी सुनाई। आरोप लगाया कि स्वास्थ्य महकमा सुधार के बजाय लापरवाही पर परदा डाल रहा है।

सीडीओ से डाक्टरों की तैनाती के बावजूद गायब रहने पर कठोर कार्रवाई की मांग की। सपा के जिला पंचायत सदस्य प्रताप सिंह ने कहा कि पीएचसी में न डाक्टर मिलते हैं और न कर्मचारी। जिला पंचायत सदस्य मोहन सिंह यादव ने कहा कि पीएचसी में डाक्टर व कर्मचारी आए दिन नहीं आते हैं लेकिन उनका वेतन निकल रहा है।

स्टाफ की कमी के माहौल में डाक्टरों की कामचोरी से हालात बद से बदतर हो गए हैं। पीएचसी में स्वास्थ्य सेवाएं दम तोड़ रही हैं। जनता में हाहाकार मचा है पर स्वास्थ्य विभाग के अफसर उदासीनता बरत रहे हैं।
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