जिला मुख्यालय के रोडवेज डिपो में मरम्मत के लिए खड़ीं बसें।
- फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। जिले में साल 2008 में खरीदी गईं रोडवेज बसें कंडम हो गई हैं। इसके बाद भी इनसे लंबी दूरी की सवारियां ढोई जा रही हैं। रक्षाबंधन पर बहनों को ले जाने वाली बसों के बेड़े में भी यह शामिल हैं। एक चक्कर के बाद इनकी डिपो में मरम्मत करानी पड़ती है। कई बार यह रास्ते में बंद हो जाती हैं। ऐसे में सवारियों को धक्का लगाना पड़ता है।
रोडवेज डिपो के पास 51 बसें हैं। इनमें ज्यादातर आठ से 12 साल का समय पूरा कर चुकी हैं। इनकी क्षमता दिल्ली या राजस्थान का सफर बिना रुके पूरा करने की नहीं रही। इसके बाद भी लंबे सफर पर भेजा जाता है। यह रास्ते में दम तोड़ देती हैं। चालक ने किसी तरह बसों को पहुंचा दिया तो वापस आना मुश्किल हो जाता है।
डिपो के पास सबसे पुरानी 2008 में खरीदी गई चार बसें हैं। इनमें दो बसों को कंडम घोषित कर नीलाम कर दिया गया। दो बसें 12 साल का समय पूरा करने के बाद भी चलाई जा रही हैं। इन्हें अभी तक कंडम नहीं किया गया। रिकार्ड में यह बसें विभाग को नियमित आमदनी करा रही हैं। इसके अलावा साल 2010 से 2013 की भी बसें चल रही हैं। विभागीय जानकारों का कहना है कि बसों को लंबे सफर पर चलाने से क्षमता कम होती जाती है। आठ साल के बाद बसें 100 किलोमीटर से अधिक चलने के काबिल नहीं रहती हैं। वैधता 12 साल की रहती है। कंडम आठ साल बाद हो जाती हैं। ऐसे में इन्हें कम दूरी में चलाया जाना चाहिए।
इन सालों में खरीदी गईं बसें
साल 2008 में दो बसें, 2010 में चार बसें, 2011 में एक, 2012 में एक, 2013 में 18, 2015 में चार, 2016 में चार, 2017 में चार, 2018 में पांच और 2019 में चार बसें खरीदी गईं। इन्हें जिले में डिपो पर भेजा गया है।