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केले की खेती में ड्रिप सिंचाई से कमाएंगे मुनाफा

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किस्वापुर में खेत में खड़ी केले की फसल। - फोटो : KANNAUJ
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कन्नौज। जिले के किसान परंपरागत खेती के बजाय दूसरी फसलों की ओर रुख कर कर रहे हैं। डार्क जोन जलालाबाद ब्लाक के तीन किसानों ने 22 बीघे में केले की फसल की है। पानी की बचत के लिए किसानों ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का लाभ लिया है। किसानों को ड्रिप सिंचाई पर 90 फीसदी अनुदान मिलेगा। ड्रिप सिंचाई से पानी की खासी बचत होगी। सिंचाई के दौरान समय भी बचेगा। खरपतवार की भी चिंता नहीं रहेगी।
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जलालाबाद ब्लाक के किस्वापुर गांव की महिला किसान मंजू देवी ने 12, ग्रीशंचद्र ने 10, छेदीलाल ने 10 बीघा खेत में केले की फसल की है। यह फसल एक वर्ष के लिए होती है। केले का पेड़ दो मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इस खेत में किसान दूसरी सब्जियों की फसल भी ले सकते हैं। इससे किसान दोहरा फायदा ले सकते हैं। जिला उद्यान अधिकारी मनोज चतुर्वेदी ने बताया कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में किसान को एक लाख 16 हजार 161 रुपये प्रति हेक्टेयर अनुदान मिलता है।
डीएचओ ने कहा कि कन्नौज जिले में सबसे अधिक आलू की पैदावार होती है। जिले में आलू आधारित कोई उद्योग न होने से खपत कम है। इससे कई बार आलू की फसल में मंदी रहती है। केले में घाटा नहीं होता है। उन्होंने कहा कि हर वर्ष जलस्तर नीचे गिर रहा है। ऐसे में किसानों को पानी की बचत के लिए सोचना पड़ेगा। टपक सिंचाई नवीन पद्धति है। किसान अपनी फसल की आसानी से सिंचाई कर सकते हैं। इस तकनीक में पौधे की आवश्यकतानुसार बूंद-बूंद पानी जड़ में पहुंचाया जाता है। पानी देने के लिए मेड़ व नालियां बनाने की आवश्यकता नहीं है। श्रम के साथ पैसे की भी बचत होती है। प्रति हेक्टेयर 300 से 400 क्विंटल उपज होती है।
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भूमि: केले की खेती के लिए जीवांश बहुल मटियार दोमट भूमि की आवश्यकता होती है। जल निकास की समुचित व्यवस्था ही केले की खेती के लिए उपयुक्त है।
बरसाई ड्वार्फ: इसके पौधे बौने (150 से 175 सेंमी),तना वजनदार, फलियां बड़ी व कुछ मुड़ी हुई, पकने में हल्की होती हैं। फल स्वादिष्ट, मीठा होता है। यह किस्म पर्ण चित्ती रोग से अधिक प्रभावित होती है।
हरी छाल: इसके पौधे बरसाई डवार्फ से बड़े (200 से 250 सेमी), मोटे, हरे धब्बे युक्त होते हैं। फलियां बड़ी, सीधी व पकने पर हरी तथा गूदा मीठा व मुलायम होता है। यह किस्म भी पर्ण चित्ती रोग से अधिक प्रभावित है।
पोषण:भूमि की उर्वरकता के तहत प्रति पौधा 300 ग्राम नत्रजन, 100 ग्राम फॉस्फोरस व 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। फॉस्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के समय तथा शेष रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में विभाजित कर अगस्त, सितंबर, अक्तूबर, फरवरी तथा अप्रैल माह में देनी चाहिए। पोटाश तीन भागों में विभाजित कर सितंबर, अक्तूबर, अप्रैल माह में देना चाहिए।
सिंचाई: केले के बाग में पर्याप्त नमी बनी रहनी चाहिए। रोपण के तुरंत बाद सिंचाई कर देनी चाहिए। आवश्यकता के तहत सात- दस दिन में सिंचाई करते रहना चाहिए।
पकाना व उपज: केले को पकाने के लिए घार को किसी बंद कमरे में रखकर केले की पत्तियों को ढक देते हैं। एक कोने में उपले व अंगीठी जलाकर कमरे को गीली मिट्टी से सील कर देते हैं। लगभग 48 से 72 घंटे में केला पककर खाने योग्य हो जाता है। इस तरह केला पकने पर चित्तियां पड़ जाती हैं। मिठास अधिक हो जाती है। केले के ढेर पर 500 से पीपीएम एर्थिल का छिड़काव कर ढेर से ढक देने से केला अच्छी तरह पकता है।
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