सोलह श्रंगार करके सुहागिनों ने शुक्रवार को करवाचौथ
का व्रत रखा और पतियों की लंबी उम्र की दुआ मांगी। सुबह से निर्जला व्रत
रही सुहागिनों ने बेसब्री से चांद के निकलने का इंतजार किया। रात को चांद
का दीदार होते ही सजी-संवरी महिलाओं ने पूजा की।
इसके बाद पतियों को
टीका लगाकर उनका आशीर्वाद लिया और व्रत तोड़ा। करवाचौथ पर चलनी से चांद को
देखने की प्रथा है। इसके पीछे मान्यता है कि महिलाएं सुंदर चांद को देखकर
जो शक्ति प्राप्त करती है। वह शक्ति सीधा उनके पति को मिल सके। इसके लिए
चलनी से चांद को देखने के बाद सीधा पति को देखती है।
शुक्रवार निर्जला व्रत
रखकर सुहागिनों ने शाम को सोलह श्रंगार किया। महिलाओं ने पेड़ा, चूरा,
गट्टा, भोग की पूड़ी और करवां से पूजा की थाली सजाई। महिलाओं ने छतों पर
करवां की आकृति बनाई। उसके सात फेरे लेकर हर फेरे पर एक सींक चढ़ाया। चांद
को देखने के बाद पति को चलनी से देखा। चांद की पूजा-अर्चना की।