कन्नौज। आलू पर एक बार फिर संकट छाया है। जिले के 110 शीतगृहों में अभी भी 1.46 लाख मिट्रिक टन आलू भंडारित है। इसे निकालने की समयसीमा 30 नवंबर है। आलू का भाव न मिलने से किसान फसल निकाल नहीं रहा है। शीतगृह मालिकों के माथे पर भी चिंता की लकीर है। उनका न सिर्फ किराया फंसा है बल्कि इतने आलू का वे क्या करें, इसकी भी चिंंता सता रही है।
सफेद आलू को तो कोई व्यापारी खरीद ही नहीं रहा है। लाल व चिप्सोना आलू भी कुछेक व्यापारी खरीद रहे हैं। किसान अगर कोल्ड स्टोर से फसल निकालता है तो उसे भाव तो मिलेगा नहीं उल्टे जेब से किराया अलग देना पड़ेगा। शीतगृह स्वामियों का कहना है कि यदि ऐसा ही रहा तो भाड़ा तो डूबेगा ही, आलू फेंकने की नौबत पैदा हो जाएगी।
उद्यान विभाग के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो कन्नौज जिले के 110 शीतगृहों में 975148.60 मीट्रिक टन आलू भंडारण की क्षमता है। करीब पंद्रह फीसदी के हिसाब से 146272.299 मीट्रिक टन आलू अभी शीत गृहों में भंडारित है। इस आलू को निकालने के लिए शीतगृह मालिक लगातार किसानों से संपर्क साध रहे हैं, लेकिन भाव न मिलने के कारण किसान शीतगृह से आलू निकालने के लिए नहीं पहुंच रहे हैं।
उद्यान विभाग ने शीतगृह स्वामियों को 30 नवंबर तक शीतगृह खाली करने के आदेश जारी किए हैं। इन आठ दिनों में आलू की निकासी न हुई तो शीतगृह स्वामियों के पास आलू फेंकने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। बाजार में सफेद आलू का कोई भाव नहीं है, जबकि लाल व चिप्सोना आलू को व्यापारी मोलभाव कर खरीद रहे हैं। जिला उद्यान अधिकारी मनोज चतुर्वेदी का कहना है कि शीतगृहों में 10 फीसदी आलू भंडारित है। उम्मीद है कि नवंबर के अंत तक निकासी हो जाएगी। शीतगृह मालिक लगातार निकासी के लिए प्रयासरत हैं। समस्त शीतगृह मालिकों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं कि वह आलू को किसी भी कीमत पर रोड के किनारे नहीं फेकेंगे। यदि रोड के किनारे किसी भी शीतगृह का आलू फिंका पाया गया तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होगी।
बंपर पैदावार बनी समस्या
कन्नौज। जिले का आलू किसान हमेशा से फसल की बर्बादी की मार झेल रहा है। पूरे सीजन पैसा लगाकर और दिन-रात तक मेहनत करके उपज पैदा करता है और बाद में उसे लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। कन्नौज और फर्रुखाबाद के साथ ही अन्य जनपदों में भी आलू की बंपर पैदावार यहां के किसानों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। पहले कन्नौज और फर्रुखाबाद ही आलू का गढ़ माने जाते थे लेकिन अब मैनपुरी, एटा, आगरा, इटावा, औरैया, हरदोई, कानपुर देहात में भी इसकी खूब पैदावार हो रही है, जो बाहर की मंडियों तक भी पहुंच रहा है। यही कारण है कि कन्नौज के आलू की मांग दूसरे जिलों में घट गई। किसान भी दूसरी फसलों को महत्व न देकर आलू को ही प्राथमिकता दे रहा है। जिला उद्यान अधिकारी की मानें तो जिले के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर कैंप लगाकर किसानों को पारंपरिक खेती की जगह दूसरी फसलों को भी बोने के लिए प्रेरित किया जाता है। कई किसान इस रास्ते पर आगे बढ़े हैं लेकिन कई अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं।