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एक साल से डॉक्टर नहीं, कर्मचारी कर रहे इलाज

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अस्पताल के मुख्य गेट पर लगा ताला। - फोटो : KANNAUJ
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गुरसहायगंज(कन्नौज)। कस्बे में केंद्र सरकार से संचालित बीड़ी श्रमिक चिकित्सालय में एक साल से डॉक्टर नहीं हैं। स्टाफ नर्स और कर्मचारी मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इससे मरीजों को बेहतर इलाज नहीं मिल पा रहा। बदहाली इस कदर है कि एक्सरे न होने से मशीन जंग खा रही है। सचल दल की गाड़ी कबाड़ हो गई। ओपीडी शुरू करने के सरकारी फरमान के बाद भी यहां कोरोना के चलते मरीजों के घुसने पर रोक लगी है। ऐसेे में मरीजों को भर्ती करने की बाबत सोचना बेमानी है। जिलाधिकारी राकेश कुमार मिश्र का कहना है कि उन्हें इस अस्पताल के बारे में जानकारी नहीं है। अब वह खुद निरीक्षण करेंगे। कमियों को दूर कराने के लिए लिखापढ़ी की जाएगी।
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गुरसहायगंज और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर बीड़ी बनाने का काम होता है। करीब 50 हजार श्रमिक इस काम में लगे हैं। इसी से इनकी रोटी चलती है। तंबाकू के काम से बीड़ी श्रमिक जल्द क्षय रोग की चपेट में आ जाते हैं। बीमारी गाढ़ी होने पर आर्थिक तंगी से इलाज कराना मुश्किल होता है। ऐसे में तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री सलमान खुर्शीद ने नगर के गोपाल नगर में बीड़ी श्रमिक चिकित्सालय की स्थापना करवाई थी। करोड़ों की लागत से बने इस अस्पताल में बीड़ी श्रमिकों के क्षय रोग का इलाज होना था। इन्हें बीड़ी कारखानों से कार्ड दिया जाता है। इसके जरिए यह अपना और परिवार का इलाज करा सकते थे। वर्ष 1994 में बना अस्पताल देखरेख के अभाव में बदहाल होने लगा। अब यहां बदइंतजामी के सिवा कुछ भी नहीं है।
अस्पताल में एक अधीक्षक और चार डॉक्टरों की तैनाती का प्रावधान है। करीब एक साल से डॉक्टर नहीं हैं। अगस्त माह में अधीक्षक का तबादला हो गया। इससे यह पद भी खाली है। स्टाफ नर्स के चार पद हैं। दो पदों पर तीन महीने से तैनाती नहीं है। एएनएम का एक पद सात साल से रिक्त है। दो फार्मासिस्ट में एक सेवानिवृत्त हो गए। ड्रेसर के दोनों ही पदों पर किसी की तैनाती नही हैं। दो साल से एक्सरे टेक्नीशियन के पद भी कोई नहीं आया। ऐसे में मरीज बाहर से एक्सरे करवाते हैं।
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चिकित्सक न होने से मोबाइल टीम हो गई निष्क्रिय
चिकित्सक न होने से मोबाइल टीम निष्क्रिय हो गई। इस टीम का काम गांव-गांव जाकर बीड़ी श्रमिकों का उपचार करना था। इसके लिए वाहन मिला था। यह गैरेज में खड़े-खड़े कबाड़ हो गया। कोरोना के चलते अस्पताल के मुख्य गेट पर ताला लगा रहता है। मरीजों को कमरे के पीछे खिड़कियों से दवा दी जाती है। मरीजों को भर्ती न करने से पुरुष और महिला वार्ड खाली पड़े हैं। इनके दरवाजों पर ताले लटक रहे।
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