मौसम का मिजाज ज्यों-ज्यों गरमा रहा है, त्यों-त्यों
स्वास्थ्य विभाग की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। गर्मी बढ़ने से मरीजों की
संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है, किंतु स्टाफ के अभाव में मरीजों का
ढंग से इलाज नहीं हो पा रहा है। मजबूरी में यहां से मरीजों को दूसरे जनपद
के अस्पतालों को रेफर कर दिया जाता है।
जिला अस्पताल को सुचारु रूप
से संचालित करने के लिए 190 पद स्वीकृत हैं, किंतु कार्यरत सिर्फ 48 लोग
ही हैं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक का पद खाली है। वरिष्ठ चिकित्साधिकारी के
दोनों पद रिक्त पड़े हैं।
वरिष्ठ फिजीशियन का एक, फिजीशियन का एक,
रेडियोलाजिस्ट का एक, काडिर्योलाजिस्ट का एक, आब्स्ट्र्ीशियन के दो, ईएमओ
महिला के तीन पद हैं, लेकिन इनमें से किसी की तैनाती नहीं है।
इसी
तरह चिकित्साधिकारी महिला के दो, फार्मासिस्ट का एक, लैब टेक्नीशियन का एक
पद खाली पड़ा है। सहायक मैटर्न का एक, सिस्टर के 16, स्टाफ नर्स के 25,
लिपिक संवर्ग में 10, फिजियोथेरेपिस्ट का एक, डार्करूम असिस्टेट का एक,
इलेक्ट्रीशियन का एक, चालक के चार, टेलर का एक, कारपेंटर का एक, कहार के
दो, कुक का एक, धोबी के पांच, वार्ड आया-वार्ड ब्वाय के 34, चपरासी के 18,
ओटी असिस्टेंट का एक, लैब असिस्टेंट के दो, क्लीनर के 4 पद रिक्त हैं।
कर्मचारियों की भारी कमी के कारण मरीजों की देखभाल सही से नहीं हो पाती है।
उन्हें समय पर दवाएं देने, इंजेक्शन लगाने आदि का काम खुद
तीमारदारों को करना पड़ता है। साफ-सफाई व्यवस्था से लेकर वार्डों को सुचारु
रूप से संचालित करने में भी कर्मचारियों की कमी से दिक्कत आ रही है।
रोजाना अस्पताल में 500 से 700 मरीज यहां उपचार कराने आते हैं। औसतन 20 से
30 मरीज गंभीर हालत में इमरजेंसी पहुंचते हैं। इनमें से ज्यादातर रेफर कर
दिए जाते हैं।
जिला अस्पताल में हृदय रोगियों का इलाज करने के लिए
पूरा वार्ड है। इसमें मरीजों को भर्ती करने के लिए चार बेड, दवा वितरण
कक्ष, ईसीजी, दो डाक्टरों के बैठने के लिए कक्ष बनाया गया था। इस पर लाखों
रुपये खर्च हुआ था, किंतु इसका लाभ मरीजों को नहीं मिल रहा है।
कारण
हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. सुनील कात्याल का करीब दो साल पहले नोएडा तबादला हो
गया था। उनके स्थान पर किसी भी डाक्टर की तैनाती नहीं की गई। जिले में किसी
भी सीएचसी-पीएचसी में भी हृदयरोग से संबंधित डाक्टर नहीं हैं। इस कारण
हृदय रोगियों को इलाज के लिए कानपुर और लखनऊ की दौड़ लगानी पड़ती है।
आकस्मिक
घटनाओं के शिकार लोगों का तत्काल उपचार करने के लिए जिला अस्पताल परिसर
में लाखों रुपये की लागत से ट्रॉमा सेंटर बनवाया गया है पर डाक्टरों और
स्टाफ की कमी के चलते इसे अभी तक चालू नहीं किया जा सका। इस कारण यह
चमचमाती बिल्डिंग मरीजों को मुंह चिढ़ा रही है। एक्सीडेंट या अन्य हादसों
में जख्मी लोग आते हैं तो मलहम-पट्टी करने के बाद कानपुर जाने के लिए रेफर
स्लिप पकड़ा दी जाती है।
हर महीने डाक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य
कर्मचारियों के स्वीकृत पद, कार्यरत पद और रिक्त पदों की सूची शासन को
भेजी जाती है। कई बार उच्चाधिकारियों के निरीक्षण के दौरान भी स्टाफ की कमी
का मुद्दा उठाया गया, लेकिन अभी तक स्टाफ नहीं मिला है।
इसी वजह
से स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में बाधा आ रही है। विशेषज्ञ डाक्टर न
होने से मरीज की हालत बिगड़ने पर उन्हें रेफर करना विभाग की मजबूरी है।
जितने संसाधन हैं, उससे बेहतर तरीके से काम किया जा रहा है।
- डा. पीएन वाजपेयी, सीएमओ कन्नौज।