इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत को याद कर
गुरुवार को चेहल्लुम पर मातमी धुनों के साथ निकले ताजिए गमगीन माहौल में
सुपुर्द-ए-खाक कर दिए गए।
मोहल्ला बिरतिया के इमाम चौक से शुरू हुआ
ताजियों का जुलूस ऊंचा, जेरकिला, जुलाहापुरी, कस्साबान और सराय होता हुआ
मुख्य मार्ग से गुजर कर पश्चिमी बाईपास पहुंचा। यहां हजरत भोंदूशाह
रहमतुल्ला अलैहे की मजार पर होकर वापस लौटा। देर शाम यह ताजिए कर्बला के
मैदान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिए गए।
जुलूस के इस्तकबाल के लिए जगह जगह सबील
लगाई गई थी। इस मौके पर करबला के शहीदों को खिराजे अकीदत पेश करते हुए
जीलानी खान ने कहा कि करबला की जंग यही बताती है कि हजरत इमाम हुसैन हक के
लिए शहीद हुए। सच्चाई के लिए जान देने वाले हारते नहीं बल्कि हमेशा जीतते
हैं। यही वजह है कि आज भी लोग हजरत इमाम हुसैन को याद करते हैं।