भारतीय संस्कृति की अधिष्ठात्री मां ही वह शक्ति है जिसने नर को नारायण बना दिया। मां ही बालक का परिचय संस्कार से करवाती है। वहीं, संस्कारित संतान राष्ट्र को सुदृढ़ बनाती है। वसंतोत्सव पर सरस्वती विद्या मंदिर में आयोजित मातृ सम्मेलन के दौरान यह विचार अर्चना पांडेय ने व्यक्त किए।
बुधवार को विद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नेहरू महाविद्यालय की सचिव इंदिरा दुबे ने कहा कि बालक कुल का दीपक और राष्ट्र का दिवाकर होता है। वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माताओं को अपनी संतान की शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। संतान के विकास में माता के महत्वपूर्ण योगदान होता है। विद्यालय प्रबंध समिति की अध्यक्ष मीरा वर्मा ने कहा कि माता ही शिशु की प्रथम शिक्षिका होती है। वह अपने त्याग और लगन से संतान के जीवन की आधार शिला रखती है। सुमन मिश्रा ने कहा कि माता ही बच्चे की प्रथम गुरू होती है। अपने बच्चों को संस्कार युक्त शिक्षा दें ताकि वह भविष्य में राष्ट्र के सुयोग्य नागरिक बन सकें। प्रधानाचार्य धर्मवीर सिंह ने माताओं से आहवान किया कि वह अपने बच्चों को संस्कार युक्त शिक्षा देने में सहयोग करें।
इससे पहले हवन-पूजन के बाद विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। अनुराग त्रिपाठी के संचालन में हुए कार्यक्रम में मिथलेश कश्यप, सुनीता शर्मा, अनुराधा त्रिपाठी, शशि सक्सेना, रेखा वर्मा, गुड्डी देवी, सत्यवती राजपूत, शोभा शुक्ला, ऊषा यादव, आराधना दुबे, रुचि त्रिपाठी, कविता दुबे, रेखा दुबे, मीना दुबे, गीता तिवारी, ममता चौहान, सीता यादव सहित कई महिलाएं मौजूद रहीं।