केके इंटर कालेज खेल मैदान पर आयोजित औद्योगिक कृषि
प्रदर्शनी व किसान मेले में दूसरे दिन भी कृषि विभाग के अफसरों और किसान
सहायकों की मेहनत रंग नहीं ला सकी। दोपहर एक बजे के बाद मेले में भीड़ नहीं
जुटाई जा सकी। कन्नौजी आल्हा व बाहर से आई हुई नुक्कड़ नाटक टीम के
कलाकारों ने खेती-किसानी व बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर आधारित नाटक पेश कर
किसानों को पांडाल में बैठाए रखने का प्रयास किया।
उधर मेले में भीड़ न
जुटने से प्रशासनिक अधिकारी भी कन्नी काट गए। जागरूकता सत्र के दौरान
सीएसए से आए कृषि वैज्ञानिक डा. सुभाष ने किसानों को जायद में बोने जाने
वाली मूंग के उन्नति शील प्रजातियों के बारे में बताया। कहा कि दलहनी फसलों
के प्रति किसानों का मोह भंग हो गया, जबकि वास्तविकता यह है कि यह फसलें
कम उत्पादन में तैयार होती है और अधिक मुनाफा कमाया जा सकता।
डा. शशिकांत
ने पशुपालन के बारे में बताया और कहा कि किसान खेती के साथ पशुपालन करके
अपनी उन्नति कर सकते हैं। कहा कि भारतवर्ष में आज भी दूध की भारी कमी है।
इसके अलावा दुग्ध उत्पादन के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही
है। जिनका किसान लाभ उठाकर आर्थिक रुप से संपन्न बने।
कृषि वैज्ञानिक
भूपेंद्र सिंह ने जायद में बोई जाने वाली फसलों में लगने वाले रोगों के
उपचार के बारे में बताया। उप कृषि निदेशक राजेश कुमार ने कहा कि कन्नौज
में अधिकतर क्षेत्र में दोमट मिट्टी है। इस मिट्टी में भरपूर उत्पादन
मिलता है, पर यह बेल्ट आलू की पैदावार के लिए विख्यात है।
यहां का किसान
आलू की अत्यधिक उत्पादन के चक्कर में उर्वरक का अधिक प्रयोग कर रहा है,
जिससे खेत की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के
लिए किसान हरी खाद का प्रयोग करें। इस मौके पर जिला कृषि अधिकारी नीरज रान,
मुख्य कार्यकारी अधिकारी मत्स्य जीसी यादव, उप निदेशक आत्मा जेपी भारती
सहित अन्य विभागों के लोग मौजूद थे।
इसके अलावा डीडीसी राजेंद्र सिंह,
उमर्दा ब्लाक प्रमुख इंद्रेश यादव, हसेरन ब्लाक प्रमुख उमाशंकर बेरिया भी
मौजूद थे। उधर, मेले के दूसरे दिन भी कोई खास भीड़ नहीं जुट पाई। इस
कारण मेले में स्टाल लगाने वाले सरकारी सहित प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी
ऊंघते नजर आए। स्टालों पर इक्का-दुक्का लोग ही पहुंचे, जबकि मेले में
स्टाल लगाने के लिए कृषि विभाग की ओर से इनसे अच्छी खासी धनराशि ली गई है।
कृषक मेले में पहुंचने वाले किसानों के लिए खाने की व्यवस्था की गई थी।
इसमें लगभग एक हजार किसानों को खिलाने की प्रतिदिन की व्यवस्था थी। खाना का
स्टाल सुबह 11 बजे शुरू करने से राहगीर समेत अन्य लोगों ने खाने का लुत्फ
उठाया और चले गए।