कन्नौज। वीवीआईपी कन्नौज लोकसभा क्षेत्र के चुनाव में आलू का मुद्दा फिर उबलने लगा है। नेता चुनावी मौसम में आलू किसानों को हर तरीके से पटाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। बीते कई बरस से नेताओं की किस्मत चमकाने वाले आलू किसानों की उंगली जिस प्रत्याशी के पक्ष में बटन दबाएगी, सांसदी उसी को मिलेगी।
जिले में 50 हजार से अधिक किसानों की रोजी रोटी आलू से चलती है। 47500 हेक्टेयर कृषि क्षेत्रफल में आलू बोया जाता है। इसके बाद भी 10 साल में शीतगृहों की संख्या 60 से 98 तक और बुवाई का कृषि क्षेत्रफल 30 हजार से 47 हजार हेक्टेयर के पार हो गया, लेकिन एक अदद फैक्ट्री नहीं स्थापित हो सकी।
सपा आलू से बोदका और अल्कोहल बनाने की फैक्ट्री लगाने की कोशिशों को गिना रही है तो बसपा व बीजेपी अब तक फैक्ट्री न लग पाने को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिशें कर रही है। नामांकन के बाद आयोजित जनसभाओं में भाजपा प्रत्याशी सुब्रत पाठक और बसपा प्रत्याशी निर्मल तिवारी वोदका बनाने की फैक्ट्री अब तक न लग पाने के लिए सपा सांसद को दोषी ठहरा चुके हैं। दोनों दलों का कहना है कि 16 साल से सपा के लगातार 6 सांसद चुने जा चुके हैं और दो बार यूपी में सरकार बनी। पहले मुलायम , फिर अखिलेश सांसद बने। आज अखिलेश मुख्यमंत्री हैं। इसके बावजूद आलू आधारित उद्योग का वायदा पूरा नहीं किया।
उधर सांसद डिंपल यादव का कहना है कि सपा को आलू किसानों की चिंता है। खुद सीएम अखिलेश यादव लखनऊ में उद्यमियों के साथ गोष्ठी कर चुके हैं। स्थानीय व बाहरी प्रदेशों के निवेशकों को आलू आधारित फैक्ट्री लगवाने के लिए बुला चुके हैं। सर्वे भी किए गए हैं। उमर्दा में मक्का फैक्ट्री का शिलान्यास हो चुका है, जबकि आलू से वोदका, अल्कोहल या अन्य उत्पाद बनाने की फैक्ट्री भी बहुत जल्द लगवाने को वह प्रयास करेंगी।
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जुआ हो गई आलू की खेती
किसान विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य प्रगतिशील किसान योगेंद्र सिंह कहते हैं कि कई दशक बाद भी आलू की खेती जुआ है। किस साल किसानों को घाटा हो जाए और कब कितना मुनाफा हो, कहा नहीं जा सकता। बड़े-बड़ों को दिल्ली पहुंचाने के बाद भी आलू किसानों की किस्मत का ताला बंद है। जब तक फैक्ट्री नहीं लगेगी तब तक ऐसा ही होता रहेगा।
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मोटा मुनाफा बिचौलियों को, घाटा किसान के मत्थे
कन्नौज। आलू किसानों की मानें तो आलू के धंधे में बिचौलिया राज कायम है। आढ़ती, व्यापारी से लेकर अब तो कोल्डस्टोरेज मालिक तक किसानों की मजबूरी को कैश कराते हैं। यूपी, बिहार, दिल्ली, लखनऊ की मंडियों में होने वाले उतार-चढ़ाव और गैर प्रांतों के व्यापारी किसानों के खेत पर जाकर सस्ते दामों पर आलू खरीदकर भंडारित कर लेते हैं। फिर जरूरत के वक्त महंगा बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं। वहीं विपरीत परिस्थितियों में किसानों को खरीददार ढूंढे नहीं मिलते। नतीजतन मंदी की मार किसानों को झेलनी पड़ती है।
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प्रभावित होने वाला इलाका
जिले कृषि क्षेत्रफल
कन्नौज 47500 हेक्टेयर
फर्रुखाबाद 34210 हेक्टेयर
कानपुर नगर 15000 हेक्टेयर
इटावा 16800 हेक्टेयर
कानपुर देहात 3500 हेक्टेयर
औरैया 5150 हेक्टेयर
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सबने दिखाए सब्जबाग
ॎ आलू किसानों को हरेक दल ने सब्जबाग दिखाए पर नतीजा नहीं निकल सका। दो दशक में बीजेपी, बीएसपी, सपा की सरकारें भी रहीं, पर वायदा अधूरा ही रहा। कांग्रेस के राहुल गांधी, दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित, बीजेपी के पूर्व सीएम राजनाथ सिंह, पूर्व सीएम कल्याण सिंह, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह, सीएम अखिलेश यादव, बसपा की पूर्व सीएम मायावती ने बीते लोकसभा और विधानसभा चुुनावों में इस मुद्दे को उठाया जरूर पर फैक्ट्री कोई नहीं लगवा पाया।
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आलू सड़ने पर फूटी कौड़ी तक नहीं मिलती
इत्र की नगरी में राजनीति की रोटियां आलू किसानों के ऊपर सेंकी जाती है, लेकिन ऐन मौके पर दगा ही मिलता है। इसी साल ओले, बारिश और झुलसा रोग ने बड़े पैमाने पर फसल को क्षति पहुंचाई। उद्यान विभाग ने भी 20 से 30 फीसदी तक नुकसान माना, लेकिन नुकसान की भरपाई के तौर पर आलू किसानों को कुछ भी नहीं मिला।
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सरकारी खरीद की योजना भी धड़ाम
बसपा सरकार ने वर्ष 2010 में आलू की सरकारी खरीद की योजना बनाई थी। क्रय केंद्र खुलवाकर आलू खरीदने को कहा गया, लेकिन बाद में रेट व समय सीमा में तालमेल न होने से सब टांय-टांय फुस्स हो गया। गेहूं व धान व गन्ना के समर्थन मूल्य घोषित करने वाली सरकारों ने कभी आलू खरीदने को लेकर इस तरह की कोई योजना नहीं बनाई।